Monday, October 31, 2011

अन्ना की टोपी

· विक्रम बेताल कथाबेताल के बोझ से लदे विक्रम हमेशा की भांति मौन थे। विक्रम की पीठ पर लदा बेताल उसी प्रकार आमोद-प्रमोद करते हुए चर्चा कर रहा था जैसे जनता की गाढ़ी कमाई पर मौज करते हुए नेता और बाबा लोग चर्चा करते है। तो आज बेताल ने कलियुग के उत्तरार्ध मे इंद्रप्रस्थ मे घटी अन्नालीला और उसके साक्षी रहे तीन व्यक्तियों “भोलूराम”, “मायाराम” एवं “चतुर राम” की कथा सुनाई। फिर बेताल ने पुलिसिया अंदाज़ मे विक्रम को डपटते हुए कहा कि इस घटना के बाद ये तीनों बिजली का कनेक्शन लेने बिजली के दफ्तर जाते है, वहाँ पर इन तीनों की क्रिया-प्रतिक्रिया सच-सच बताओ वरना थर्ड डिग्री देकर तेरे सर के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। विक्रम ने इनकी क्रिया-प्रतिक्रिया इस प्रकार बताई:भोलूराम ने जे ई से कहा कि मैंने प्रण किया है कि न घूस लूँगा न दूँगा। इस बात को सुनकर जे ई ने महीने भर इतना दौड़ाया कि पैरागान चप्पलें भी फट गई। उसके बाद भोलूराम ने 2000 रुपए देकर कनेक्शन लिया। मायाराम ने दफ्तर मे जाते ही जरूरती कागजों के साथ 2000 रुपए जे ई को सौपे और अगले दिन ही उसका कनेक्शन लग गया।चतुर राम ने दफ्तर मे पहुचने के बाद जे ई से मुस्करा कर अभिवादन किया और कलफ लगी सफ़ेद चमकती अन्ना टोपी सर पर ग्रहण की, फिर जरूरती कागजों के साथ 1000 रुपए जे ई को सौपे। अगले दिन ही उसका भी कनेक्शन लग गया और जे ई उसका चेला भी बन गया।

खंडहर

· उनकी गृहस्थी आज सिर्फ 2 चलायमान बैग मे सिमटी है। उन्होने कभी तिनका-तिनका बीन बुलंद गृहस्थी जुटाई थी।

सुहाग के चिन्ह

· विधवा माँ: आज तीज है, तुम्हारा पैर सूना है। मेरा आल्ता रखा है, पैर रंग लो।सुहागन बेटी: रहने दो माँ, मैं बाजार से मंगा लूँगी।

सुहाग के चिन्ह

· विधवा माँ: आज तीज है, तुम्हारा पैर सूना है। मेरा आल्ता रखा है, पैर रंग लो।सुहागन बेटी: रहने दो माँ, मैं बाजार से मंगा लूँगी।

तोंद के लाभ

· उनको अपने पति से कोई शिकायत नही थी क्योंकि मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, धन-दौलत, एश्वर्य सभी कुछ तो दिया था उन्होने। बस एक ही शिकायत थी, उनकी विराट ब्रम्हान्ड को प्रतिरूपित करती कलश रूपी विराट तोंद के, क्योंकि वही तो एक सौत की भांति हमेशा उनके और उनके "उनके" बीच मे आ जाती थी। लेकिन आज वो उसी तोंद पर प्यार से हाथ फिरा रही थी क्योंकि उसी तोंद की वजह से तो उस भीषण कार-दुर्घटना मे भी वह बिना बाल बांका हुए ही सुरक्षित बच गए थे।

लातों के भूत

· वो जैसे ही चाट के ठेले पे आई, कई जोड़ी आंखे उसका एक्स रे लेने मे तत्पर हो गई। उसकी शख्सियत भी कुछ अजीब सी थी, एक अजब सी बेफिक्री चाल-ढाल मे जैसी निचले तबके के नौजवानों मे प्रायः देखने को मिलती है। अगर उसके जेवरों को अलग कर दिया जाता तो पहनावा भी वैसा ही था, चुस्त जींस, ढीली सी टी-शर्ट और उन पर बेतरतीबी से उड़ते बाल। आखिर कुछ मनचलों से रहा न गया और छेड़खानी कर ही दी। अचानक बिजली सी चमकती फुर्ती से उस लड़की ने अंगीठी से गरम सलाख खींच कर उन लड़कों पे तान दी। अब वो साक्षात दुर्गा रूप मे “पूजनीय” थी।

बच्चे की सीख

· उसको अपने बच्चे को सर्वगुण सम्पन्न बनाने की सनक थी। उसे जितना आता था वो सब बच्चे को सिखा देना चाहता था, लेकिन बच्चा था कि बार-बार सिखाने पे भी A उल्टा ही बना रहा था। उसने खीझ कर बच्चे को पीट दिया और खुद जाकर लेट गया। बच्चा थोड़ी देर रोने के बाद मासूमियत के साथ उसके पास आया और उसकी गोद मे पापा-पापा बोल कर खेलने लगा। आज उसने अपने बच्चे से अपमान और क्रोध के आवेग को भूलकर प्यार बाटना सीखा था।

जनचेतना

· राजमाता के पास बोलने की ताकत गिरवी रखने के कारण धृतराष्ट्र मौन थे। राजमाता ने भी आंखो पे पट्टी बांध रखी थी। दुर्योधन और दुःशासन अनर्गल प्रलाप कर रहे थे। लोकतन्त्र का चीरहरण हो रहा था। लेकिन लगता है कृष्णरूपी जनचेतना जाग चुकी है।

गेंहू और गुलाब

· मैं उसके दुकान पे कभी-कभी चाय पीने जाया करता था। वो एक मोटी सी चोटी सिर पे बांधता था और चभियों का गुच्छा उसके जनेऊ मे लटकता था। नाम था उसका “अवधेश सिंह पंडित”। कुछ दिनों बाद ओ बी सी कोटे से उसकी भर्ती कांस्टेबल के पद पे हो गई। तब उसका पूरा नाम पता चला “अवधेश सिंह पंडित यादव”।

हादसा

· माँ- बाप लड़ रहे थे। बच्चे कोने मे दुबके हुए चीख रहे थे। बच्चा कभी माँ तो कभी बाप को अपराधी मानते हुए बड़ा होता है और मन ही मन कसमें खाता है अपने बच्चों के सामने कभी नही झगड़ेगा लेकिन होनी पे किसका बस चलता है? एक दिन खीझ और कुंठा मे पत्नी का कत्ल हो ही जाता है। दूसरे दिन सारे अखबार और चैनल उस नर-पिशाच की कहानी चीख-चीख कर बयान कर रहे थे। लेकिन इस सच को सभी दरकिनार कर रहे थे कि वक्त परवरिश करता है बरसों, हादसा यूं एकदम नही होता।

अन्ना की आमदनी

· वो भी अन्ना हज़ारे को दुआएं दे रहे थे क्योंकि कम मेहनत मे ही उनकी आमदनी अच्छी हो रही थी। वो दिल्ली की सड़कों पर प्लास्टिक की बोतलें और रद्दी बीनने वाले बच्चे थे।

फिसल पड़े तो हर हर गंगे।

· उनका अन्ना के आंदोलन से कोई वास्ता नहीं था। वो तो रोज की तरह मॉर्निंग वाक के लिए राजघाट की तरफ टहलने निकले थे। पुलिस को भी यही समझा रहे थे कि अचानक नजर टी वी कैमरों पर पड़ी। प्रत्युत्पन्नमति से वह भी सड़क पर लोट-लोट कर चिल्लाने लगे "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है"। सही है - फिसल पड़े तो हर हर गंगे।

मैं अन्ना के खिलाफ हूँ।

मैं अन्ना के खिलाफ हूँ कि क्योंकि उनकी मांगे हमारे खिलाफ हैं। वो कहते हैं “भ्रष्टाचार खत्म करो”। मैं कहता हूँ कि इतने सालों में भ्रष्टाचार का एक सिस्टम पैदा हुआ है जो आज जमाने में शिष्टाचार का रूप ले चुका है, सबका पर्सेंटेज फिक्स हुआ है, सबका धंधा ईमानदारी से चल रहा है। अब वक्त की जरूरत है कि एक कदम आगे जाकर भ्रष्टाचार को वैधानिक करने का अर्थात रेट लिस्ट तय हो जाय कि किस काम के लिए कितनी रिश्वत किसको देय होगी, न कि वापस गांधी जी के समय में जाकर भ्रष्टाचार के सिस्टम को नष्ट करने की कोशिश करते हुए देश में अराजकता फैलाई जाय।क्रिकेट की टीम इंडिया के खेल में तो स्थिरता है नही, कम से कम राजनीति के खेल मे तो स्थिरता है। कुछ समय संप्रग तो कुछ समय राजग , दोनों मिल कर देश मंथन का खेल खेल रहे है और रत्न आपस मे बाँट रहे है। रही बात हलाहल कि तो ये तो सवा अरब भोलों का देश है, अपने-अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा पी लेंगे, बात फिनिश। अन्ना का वश चले तो इस खेल का मज़ा भी भंग कर दें। अन्ना एंड पार्टी तो मानती नही कि राजा भगवान के समान होता है। वो हमारे राजा साहेबो से सुधरने कि मांग कर रहे है और राजा साहेब फरमा रहे है कि जब तक देश का अंतिम व्यक्ति नही सुधरता, उनसे सुधरने की मांग असंवैधानिक है। अन्ना चाहते है कि उनके द्वारा तैयार लोकपाल विधेयक लागू किया जाय। अब जब अन्ना जैसे गैर संसदीय लोग कानून बनाएँगे तो माननीय सांसद साहेबान संसद में गन्ना छीलेंगे क्या? अब तो कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे दूरदर्शी और दूर की कौड़ी खोज कर लाने वाले नेताओं को चाहिए कि वो अन्ना एंड पार्टी द्वारा चलाये जा रहे दुष्प्रचार को आई एस आई से लिंक करते हुए उनको देश में अराजकता फैलाने के आरोप में तिहाड़ के पीछे करें।

मैं अन्ना के खिलाफ हूँ।

मैं अन्ना के खिलाफ हूँ कि क्योंकि उनकी मांगे हमारे खिलाफ हैं। वो कहते हैं “भ्रष्टाचार खत्म करो”। मैं कहता हूँ कि इतने सालों में भ्रष्टाचार का एक सिस्टम पैदा हुआ है जो आज जमाने में शिष्टाचार का रूप ले चुका है, सबका पर्सेंटेज फिक्स हुआ है, सबका धंधा ईमानदारी से चल रहा है। अब वक्त की जरूरत है कि एक कदम आगे जाकर भ्रष्टाचार को वैधानिक करने का अर्थात रेट लिस्ट तय हो जाय कि किस काम के लिए कितनी रिश्वत किसको देय होगी, न कि वापस गांधी जी के समय में जाकर भ्रष्टाचार के सिस्टम को नष्ट करने की कोशिश करते हुए देश में अराजकता फैलाई जाय।क्रिकेट की टीम इंडिया के खेल में तो स्थिरता है नही, कम से कम राजनीति के खेल मे तो स्थिरता है। कुछ समय संप्रग तो कुछ समय राजग , दोनों मिल कर देश मंथन का खेल खेल रहे है और रत्न आपस मे बाँट रहे है। रही बात हलाहल कि तो ये तो सवा अरब भोलों का देश है, अपने-अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा पी लेंगे, बात फिनिश। अन्ना का वश चले तो इस खेल का मज़ा भी भंग कर दें। अन्ना एंड पार्टी तो मानती नही कि राजा भगवान के समान होता है। वो हमारे राजा साहेबो से सुधरने कि मांग कर रहे है और राजा साहेब फरमा रहे है कि जब तक देश का अंतिम व्यक्ति नही सुधरता, उनसे सुधरने की मांग असंवैधानिक है। अन्ना चाहते है कि उनके द्वारा तैयार लोकपाल विधेयक लागू किया जाय। अब जब अन्ना जैसे गैर संसदीय लोग कानून बनाएँगे तो माननीय सांसद साहेबान संसद में गन्ना छीलेंगे क्या? अब तो कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे दूरदर्शी और दूर की कौड़ी खोज कर लाने वाले नेताओं को चाहिए कि वो अन्ना एंड पार्टी द्वारा चलाये जा रहे दुष्प्रचार को आई एस आई से लिंक करते हुए उनको देश में अराजकता फैलाने के आरोप में तिहाड़ के पीछे करें।

फेंगशुई

· आज बेटा-बहू घर की खुशहाली के लिए फेंगशुई वाला बुड्ढा लाये है, जिसमे बच्चे उसके चारों तरफ खेल रहे है। घर के कोने मे पड़ा बुड्ढा बाप सम्मानजनक व्यवहार के लिए तरस रहा है।

फेंगशुई

· आज बेटा-बहू घर की खुशहाली के लिए फेंगशुई वाला बुड्ढा लाये है, जिसमे बच्चे उसके चारों तरफ खेल रहे है। घर के कोने मे पड़ा बुड्ढा बाप सम्मानजनक व्यवहार के लिए तरस रहा है।

फेसबुक आन्दोलन

· आज दिन खर्चीला बैठा लेकिन कई काम बड़ी सहूलियत से हो गए मसलन बिजली के बिल की रीडिंग ही ठीक करवानी थी लेकिन लाइनमैन को दो सौ रुपये देकर काम घर बैठे मोबाइल पर ही हो गया। हिसाब लगाता हूँ तो दो सौ रुपये तो दो दिन दौड़ने मे ही फुक जाते और समय बर्बाद होता सो अलग, इसलिए दो सौ रुपये चुपचाप लाइनमैन को देकर काम निकलवाना कोई बुरा सौदा तो नही था। अब जाकर शाम को फुर्सत मिली है, सोचता हूँ अन्ना हज़ारे को फेसबुक या मोबाइल पर से ही समर्थन दे दूँ।

माँ की मन्नत

· लड़का घर से भाग गया था। माँ ने मन्नत मांगी कि लड़के के घर वापस आने पर अपने सारे जेवर संत श्री के कदमों मे अर्पित कर दूँगी। लड़का कुछ दिनों बाद घर वापस आ गया। माँ को मन्नत याद थी सो वो लड़के के साथ संत श्री के आश्रम मे अपने सारे जेवरों के साथ गई। संत श्री उन दिनों साधना मे लीन थे इस लिए किसी से मिलते नही थे। माँ ने अपनी मन्नत संत श्री के मैनेजर को बताई। कुछ देर बाद संत श्री का बुलावा आ गया। माँ गदगद थी कि संत श्री का उन पर विशेष अनुग्रह है, लेकिन लड़के के मन मे अपनी ही उलझन थी कि ये अनुग्रह है या माया का चमत्कार?

राखी का नेग

· बहन भाई को राखी बांध रही थी और मन मे हिसाब लगा रही थी, 250 की मिठाई, 15 की राखी और 50 रुपये ऑटो के किराये के। भय्या को 500 से कम नही देना चाहिए। उधर भाई अपनी पत्नी की घूरती आंखो से परेशान मन मे निर्णय नही ले पा रहा था की 251 या 501

भेड़िये

· एक नैतिक युवा नया-नया अफसर बना। जिन लोगों ने लिए जाने वाले ऋण के सापेक्ष वस्तुओं का क्रय नहीं किया था, उनकी ऋण अनुदान की फाइलें उसने रोक दीं। उसके अफसरों ने उसे टारगेट पूरा न होने पर उसकी चरित्र प्रविष्ठि पर लाल बिन्दु अंकित होने का भय दिखाया तो उसने दबाव में आकर वो फाइलें निस्तारित कर दीं। सायंकाल उसका हिस्सा उसके घर पहुँच गया। भ्रष्टाचारी भेड़ियों की जमात में एक संख्या और बढ़ चुकी थी।

कंजूस का धन

· वो अकेला प्रौढ़ विधुर बहुत कंजूस था। कंजूसी के कारण रिश्तेदार भी उसके पास नहीं आते थे। पूछने पर कहता था कि बुढ़ापे मे जब हाथ-पैर नहीं चलेंगे तब ये पैसे काम आएंगे। एक दिन वो मर गया। रज़ाई-गद्दों से मिले लाखों रुपये के लिए उसके रिश्तेदार उसे कोसते हुए आपस मे लड़ रहे थे।

बुढौती की लाठी

वो बुड्ढी विधवा औरत उस बड़े मकान मे अकेले रहने से डरती थी। बच्चों के समझाने पर मकान बेच कर पैसे बच्चों मे बाँट दिये। अब वो किराए के छोटे से मकान मे फिर अकेले रहती है।

मन का माइग्रेन

कल उसके सास-ससुर आए थे। उसने उनका पूरा सत्कार किया लेकिन पूरे समय माइग्रेन के कारण उसका मुंह ऐसा लटका था कि यदि कोई उससे कोई फरमाइश अपने मन से करता तो वह स्वयं आत्मग्लानि से भर जाता। उसके सास-ससुर रात ही वापस लौट गए थे। अजब संयोग था कि उसी रात उसके माता-पिता मिलने आ गए थे। अब वो चहकती हुई उनका स्वागत- सत्कार कर रही थी। माइग्रेन गायब हो चुका था।

भैंस की सुई

एक सयाने ग्रामीण ने अपनी भैंस के इलाज के लिए डॉक्टर को बुलवाया। भैंस के इलाज से ज्यादा फिक्र उसे इलाज मे आने वाले खर्चे से थी। डॉक्टर भी सयाना था और उसकी मनोस्थिति भाँप चुका था। डॉक्टर ने कहा कि कई सुइयां लगेगी और हर सुई की कीमत 20 रुपये है, कहो तो लगा दूँ। ग्रामीण ने कहा लगा दो जी। डॉक्टर ने कुछ जरूरी दवाओं के बाद डिस्टिल वाटर की सुइयां लगानी शुरू कर दी। डॉक्टर ने इस तरह कुल बीस सुइयां घोंपी। अब डॉक्टर ने सुइयों के दाम मांगे तो सयाने ग्रामीण ने कहा, “जी आपने 15 सुइयां लगाई, ये लीजिये अपने 300 रुपए”। डॉक्टर जेब मे रुपए रख कर चुपचाप चला गया। इधर सयाना ग्रामीण अपने मन मे खुश था कि उसने अपनी चतुराई से सौ रुपए बचा लिए थे, उधर डॉक्टर खुश था कि दो सौ रुपए तो उसे पानी की सुइयों के मिले थे।

बेशर्मी मोर्चा

उसके पिता रिटायर होने वाले थे इसलिए उन्हे भी अपनी लाड़ली की शादी जल्दी करवाने की फिक्र थी। कई जगह हाथ- पाँव मारने के बाद एक परिवार मे बात चल निकली थी। लेकिन बुरा हो इन मीडिया वालों का जो एक ही बाइट को बार- बार दिखाते रहते है। बेशर्मी मोर्चा के जुलूस मे उसका चेहरा भी टी. वी. पर बार-बार प्रसारित हो गया और पढे-लिखे संस्कारवान परिवार ने बेशर्म लड़की से शादी के लिए इंकार कर दिया।

अब मैं भी बड़ा हो चुका था।

· बारहवीं के बाद घर से बाहर जाकर पढ़ने की ललक उफान पर थी। प्रोफेशनल कॉलेज मे दाखिला भी हो गया। स्टेशन पर परिवार छोडने आया था। घर से बाहर जाने की जो उत्सुकता थी, वो घर से दूर होने की कल्पना से ही व्याकुलता मे बदल चुकी थी। ट्रेन की सीटी बजने पर मैंने पापा का हाथ पकड़ लिया, जिसे पापा ने दूसरे हाथ से थपकाते हुए हौले से छुड़ा लिया। आँखों के कोनों मे नमी उनके भी थी और मेरे भी, लेकिन दोनों चुप थे। शायद अब मैं भी बड़ा हो चुका था।

मिस्टर नागनाथ

· मिस्टर नागनाथ कल फुफकार रहे थे।कारण: उनकी जवान होती बेटी को किसी ने छेड़ दिया था।मिस्टर नागनाथ के चेहरे पर आज जहरीली मुस्कान चस्पा थी।कारण आज जवान टाइपिस्ट ने जांघ से जांघ रगड्ने पर प्रतिकार नहीं किया था।

नमक की कीमत

· उस बड़े शहर के छोटे से मकान मे वो बुजुर्ग दंपत्ति अपने जीवन का अंतिम पड़ाव भुगत रहे थे। रिश्तो के लिए मरुस्थल बन चुके उस शहर मे उनके पास रिश्तों के नाम पर मात्र एक विश्वासपात्र नौकरानी थी। एक और भी रिश्ता था उनका, उस कुत्ते के साथ, जिसको वो रात का बचा खाना दिया करते थे। एक दिन वो अपने मकान मे मृत मिले। उनको देखने वालों के हुजूम मे वो विश्वासपात्र नौकरानी भी थी। उस पर कुत्ता लगातार भौंक रहा था। वो अभी नमक की कीमत अदा करना भूला नहीं था।

कौवे

· सड़क पर आदमी आ जा रहे थे। आसमान मे कौवे उड़ रहे थे। सड़क के किनारे बिजली के खंभे पर एक मजदूर बैनर टांग रहा था। एक कौवा बिजली के तारों के चपेट मे आकर जमीन पर गिर गया। सारे कौवे शोर मचाते हुए इकट्ठे हो गए। उन कौवों की चीख पुकार से अचंभित वो मजदूर भी जमीन पर गिर गया। सड़क पर आदमी अभी भी आ जा रहे थे।

छोटी मछली

संत श्री विशाल आयोजन मे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड्यंत्र पर व्याख्यान दे रहे थे कि किस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। उनकी संस्था के स्वदेशी उत्पाद भी आयोजन मे विक्रय हेतु उपलब्ध थे। उधर आयोजनकर्ता पांडाल के बाहर सस्ते जूस के ठेले वालों को खदेड़ रहे थे।

जोंक

· कांट्रैक्ट पर काम करते हुए आठ साल बीत गया था। आज बॉस के पास गया कि अब परमानेंट कर दीजिये। उत्तर मिला "नही तुम लोग जोंक की तरह इस आफिस मे चिपक जाओगे।" कुछ देर बाद बॉस की काल आई क्योंकि एक आवेदन हिन्दी मे टाइप करना था। आवेदन का विषय था " अधोहस्ताक्षरी की प्रतिनियुक्ति को आगामी तीन वर्षों के लिए बढ़ाने हेतु प्रार्थनापत्र। "

बहु की विदा

-“हम बहू को विदा कराके नही ले जाएगे”। लड़के के बाप ने कलेवा के बाद घोषणा कर दी।
-“क्यों भाईसाहेब? क्या कमी रह गई हमसे”? लड़की का माँ विनयवत होकर पूछी।
-“आप लोगों ने हमारी नाक कटा दी। कलेवा मे आपने सभी बारातियों को चाँदी के सिक्के नही दिये”।
-“लेकिन 151 रुपए के लिफाफे तो दिये न”।
-“हाँ, लेकिन कलेवा मे चाँदी के सिक्के दिये जाते हैं, इतना भी आपको नही पता। कैसे आपने अपनी और लड़कियों की शादी की है? क्या पहली बार कायस्थों मे शादी कर रही है”?
-“लेकिन पिता जी, आपने जो-जो रस्में जैसे-जैसे निभाने को बतायीं थी, वैसे ही तो निभाया गया है”। अब लड़की के भाई ने मोर्चा संभाला।
-“तो क्या अपना दिमाग नही लगाना चाहिए? कैसे कायस्थ हो”?
-“अब आपने तो मिठाइयों के नाम के साथ मिठाई की दुकान का नाम भी बता दिया था तो इतनी महत्वपूर्ण बात आप कैसे भूल गए”?
-“हमसे जबान मत लड़ाओ। हमारी नाक कटवा दी, हम लड़की विदा कराके नही ले जाएँगे”।
-“तो हम आपको भी विदा नही करेंगे। आपका यहाँ स्वागत है, जितने दिन यहाँ रहना चाहे, यहाँ रहे, आपके खाने-पीने का पूरा इंतेजाम यहाँ रहेगा”। लड़की के भाई ने भी विनयपूर्वक लेकिन दृढ़ शब्दों मे लड़के के पिता को सुना दिया। कुछ ही देर मे वेडिंग पॉइंट के दरवाजे बाहर जाने के लिए बंद हो गए और हलवाई लड़के के पिता से पूछने आ गया कि “बाबू जी दिन के खाने मे क्या पसंद करेंगे”? कुछ देर मे ससुराल पक्ष वाले खुद ही लड़के के पिता को समझाने लगे और माननीय लड़की की विदा को तैयार हो गए। विदा के समय लड़के के मामी खुसुर-फुसुर कर रही थी कि ये शादी लंबे समय तक याद रहेगी और उधर लड़की अपनी माँ से लिपट के रो रही थी “ये लोग मुझे वहाँ परेशान तो नही करेंगे” और माँ उसे सांत्वना दे रही थी “तुम धैर्य रखना, कुछ दिन मे सब सामान्य हो जाएगा”।

मनुष्यत्व

सुबह-शाम खाना देने के कारण दो कुत्ते अक्सर मेरे दरवाजे पे ही रहते थे। किसी दूसरे कुत्ते को उधर रहने देना तो दूर, क्या मजाल कि कोई दूसरा कुत्ता उनकी रोटी सूंघ भी ले! कल सुबह एक पिल्ला घूमता-फिरता उधर आ गया। वे दोनों उस पिल्ले पे बुरी तरह भौंके। जवाब मे वो पिल्ला अपनी पूंछ दबा कर कूँ कूँ करने लगा। वे दोनों चुप हो कर बैठ गए। पिल्ला भी उनसे थोड़ा हटकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद जब मैंने रोटी फेंकी तो वो पिल्ला भी कूँ कूँ करते हुए रोटी के पास आ गया। फिर वे दोनों बिना रोटी खाये कहीं चले गए और अभी तक वापस नही आए। उन कुत्तों के इस गुण को क्या कहेगें “श्वानत्व (कुत्तत्व)” या “मनुष्यत्व”?

नैतिक शिक्षा

पापा, आज क्लास मे सिर्फ मेरे सारे आन्सर सही थे।
-शाबाश! मैडम ने कुछ पूछा?
-हाँ, उन्होने पूछा कि ये किसने सोल्व कराया?
-तो तुमने क्या कहा?
-मैंने बता दिया कि पापा ने सोल्व कराया था
-अरे बेटा, थोड़ा प्रैक्टिकल बन, कह देता मैंने खुद सोल्व किया था।
-पापा, एक बात बताओ, मैडम साइंस मे जो थ्योरी पढ़ाती है, प्रैक्टिकल मे उसे प्रूव करके दिखाती है। लेकिन मॉरल साइंस मे जो पढ़ाती है, प्रैक्टिकल मे उसका उल्टा क्यूँ होता है?
क्या इसका कोई जवाब है?

दलाल की दलील:

उसे दिल्ली का महज एक कार्यालय कहना उसका अपमान होगा। उसे तो विकास योजनाओं के लिए बहने वाली धनराशि की गंगोत्री कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। तो वहाँ लगभग दस सालों बाद मेरा एक कालेज का सहपाठी मिल गया। हम दोनों के मुह से बेसाख्ता निकाला “ अरे तुम यहाँ”। लेकिन सच बोलूँ तो उसकी रईसी को देखकर मेरे मन मे ईर्ष्या पनप गई थी।
-क्या तुम यही जॉब करते हो?
-नही, मेरा अपना प्रोजेक्ट कन्सेल्टी का काम है, उसी सिलसिले मे यहाँ आया था। पास मे मेरा ऑफिस है, वही चलते है।
-अभी नही, फिर कभी। लेकिन प्रोजेक्ट कन्सेल्टी का मतलब यही हुआ न कि एनजीओ से प्रोजेक्ट पास करवाने का ठेका लेकर यहाँ पर अपनी सेटिंग से प्रोजेक्ट पास करवा देते हो। मैं ईर्ष्यावश कुढ़ कर बोला।
प्रतिउत्तर मे वह सिर्फ मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट का मतलब था मेरा प्रहार खाली गया अतः मैंने दूसरा प्रहार किया “यार दलाली के काम को तुम्हारा जमीर गवारा कैसे करता है”? इस बार शायद मेरा वार काम कर गया था। उसने जवाब दिया “नही, तुम इसे गलत तरीके से सोच रहे हो। यूं समझो कि पराये आदमी की पत्नी की तरफ आँख उठा कर देखना भी पाप है लेकिन अगर वो बहुत बीमार हो जाये तो उसे गोद मे उठा कर भी अस्पताल पहुचाना पुण्य है”।
क्या आप इस दलील से सहमत है?

फेरी वाली

ब्बाभी जी, चादरें ल्लोगी।
-न बेटा, नही चाहिए।
-देख तो ल्लों, ल्लेना न ल्लेना तो बाद की बात है।
-अरे जब मुझे लेनी ही नही है तो क्यों अपना समय बर्बाद करोगी।
-मेरा तो काम ही है लोगों को चादरें दिखाना। कछ-भुज की चादरें है, आप भी देख लो, अब तो त्योहारों का मौसम भी आ रहा है।
-ये वाली चादर कैसे है?
-ब्बाभी जी ये तो चादर और सोफ़ा-कवर का पूरा सेट है, आप के कमरे मे बहुत फबेगा, एक दाम बोल्लूंगी 2500 रुपये।
-न बेटा ये तो बहुत ज्यादा है।
- अच्छा बोल्लों आप क्या बोलती हो इसके?
-1000 रुपए।
-ये क्या ब्बाभी जी? मेरे सर की कसम, 2200 की खरीद है, 300 तो इतनी धूप मे दौड़-धूप के बाद बचना ही च्चाहिए न।
-नही, नही 1000 बिलकुल ठीक बोल रही हूँ।
-ब्बाभी बोहनी का वक्त है, इसलिए आपको चादर देनी ही है। पहला गाहक भगवान होता है इसलिए आपके यहाँ से खाली नही लौटूंगी। एक दाम 1500, बोल्लों आप क्या बोलती हो?
-बस 1200, इससे ज्यादा एक पैसा नही।
-चलो ब्बाभी दो, बोहनी के समय है, आपको नर्राज़ नही कर सकती।
भाभी जी 700-800 का सेट 1200 मे खरीद कर इतरा रही थी और वो सधी हुई गुजरातन व्यापारी नए ग्राहक को खोजने चल पड़ी थी।

माँ की पीड़ा

पढ़ने बैठ जा बेटा, तेरे पापा आते ही होंगे।
न माँ, मुझे होमवर्क समझ नही आ रहा है, पापा से पूछ कर ही करूंगा।
अच्छा किताब-कॉपी तो निकाल, ला मैं मदद कर देती हूँ। माँ ने बेटे को पुचकारा।
आप क्या हेल्प कर पाओगी? बच्चा भुनभुनाया।
ये लो मेरी होमवर्क डायरी। अब बताओ क्या करूँ?
माँ ने डायरी हाथ मे ले तो ली, लेकिन अँग्रेजी मे लिखा क्या समझती? वो तो गाँव के स्कूल से दसवीं पास थी।
अच्छा तो तुम्हारे टीचर का नाम यू डे तिवारी (Uday Tiwari) है। माँ ने फिर भी कोशिश की।
हा हा हा माँ, पापा तुम्हें सच ही गंवार कहते है। बच्चा ठहाका लगा उठा।
माँ के आँखों के पोर से आँसू ढलक पड़े।
बबलू, माँ से ऐसे बात करते है? बेटी ने माँ की पीड़ा का मर्म समझ लिया था।

Sunday, October 30, 2011

टी वी सोप

वो मन मे कितने ख्वाब बुनते हुए आज सालों बाद सिर्फ आधे घंटे के लिए बहन से मिलने आ पाया था। उसने कितने बहाने मन मे सोच रखे थे की जब बहन इतने दिन बाद आने का शिकवे उससे करेगी, तो वो कहेगा “कि बहन साल मे एक बार ही तो बॉर्डर से घर आने की छुट्टी मिलती है, उसमे घर के ही इतने काम होते है कि तुमसे मिलने चाह कर भी नही आ पाया”। लेकिन ये क्या! बहन भाई का सत्कार करने को तत्पर तो हो रही थी पर निगाहे थी कि बरबस टी वी सोप पर चिपक जा रही थी।

रिज़र्वेशन काउंटर

- भाई, ये गोरखपुर कौन-कौन सी ट्रेन जाती है...................?
- मुझे नही पता..................। इन्क्वायरी पर पूछ लो.....................।
- इन्क्वायरी पे तो इतनी भीड़ है, किससे पूछूँ.........................?
- उधर टाइम-टेबल से देख लीजिए................।
- .................................
- ................................
- भाई ये हावड़ा एक्सप्रेस गोरखपुर कब पहुँचती होगी.............................?
- मुझे क्या पता............................।
- अच्छा, यहाँ से तो समय से ही छूटती होगी.....................?
- अरे मुझे क्या मालूम, क्या मैं रेलवे इन्क्वायरी हूँ?
- तो इतना चिड़चिड़ा क्यूँ रहे हो? कह दो मुझे नही मालूम………………।
- तो इतनी देर से क्या कह रहा हूँ?
- अजीब बेमरौव्वत आदमी हो। आजकल तो किसी से बोलना भी दुश्वार है.................।
- अरे मुझे मालूम है, यहाँ लोग बातों मे ही उलझा कर जेब काट लेते है......... ।
- क्या तुम्हें मैं जेबकतरा लगता हूँ........................?
- क्या किसी के चेहरे पे चिपका है कि वो शरीफ है.................?
- वो तो तुम्हारे चेहरे पे भी नही चिपका है कि तुम जेबकतरे नही हो...............।

जेबकतरा! जेबकतरा! टन! टन! आस-पास लाइनों मे लगे लोगो का अवचेतन मन सक्रिय हुआ और हाथ खुद ब खुद अपनी-अपनी भारी जेबों पर चला गया। इस दृश्य को कुछ जोड़ी आंखो ने स्कैन कर लिया और एक –दो जेबें उस रेलमपेल मे साफ हो गईं। शाम को वो दोनों अपना रिज़र्वेशन कैंसल कराने फिर लाइन मे लगे थे।

रिज़र्वेशन काउंटर

- भाई, ये गोरखपुर कौन-कौन सी ट्रेन जाती है...................?
- मुझे नही पता..................। इन्क्वायरी पर पूछ लो.....................।
- इन्क्वायरी पे तो इतनी भीड़ है, किससे पूछूँ.........................?
- उधर टाइम-टेबल से देख लीजिए................।
- .................................
- ................................
- भाई ये हावड़ा एक्सप्रेस गोरखपुर कब पहुँचती होगी.............................?
- मुझे क्या पता............................।
- अच्छा, यहाँ से तो समय से ही छूटती होगी.....................?
- अरे मुझे क्या मालूम, क्या मैं रेलवे इन्क्वायरी हूँ?
- तो इतना चिड़चिड़ा क्यूँ रहे हो? कह दो मुझे नही मालूम………………।
- तो इतनी देर से क्या कह रहा हूँ?
- अजीब बेमरौव्वत आदमी हो। आजकल तो किसी से बोलना भी दुश्वार है.................।
- अरे मुझे मालूम है, यहाँ लोग बातों मे ही उलझा कर जेब काट लेते है......... ।
- क्या तुम्हें मैं जेबकतरा लगता हूँ........................?
- क्या किसी के चेहरे पे चिपका है कि वो शरीफ है.................?
- वो तो तुम्हारे चेहरे पे भी नही चिपका है कि तुम जेबकतरे नही हो...............।

जेबकतरा! जेबकतरा! टन! टन! आस-पास लाइनों मे लगे लोगो का अवचेतन मन सक्रिय हुआ और हाथ खुद ब खुद अपनी-अपनी भारी जेबों पर चला गया। इस दृश्य को कुछ जोड़ी आंखो ने स्कैन कर लिया और एक –दो जेबें उस रेलमपेल मे साफ हो गईं। शाम को वो दोनों अपना रिज़र्वेशन कैंसल कराने फिर लाइन मे लगे थे।

बाबा भारती aur मर्सिडीज

बाबा भारती को अपनी मर्सिडीज से बहुत प्यार था। उनके आश्रम के पड़ोसी गाँव के प्रधान जालिम सिंह की नज़र उनकी मर्सिडीज पर थी। जालिम सिंह विश्वासपात्र अनुयायी बनकर उनका सारथी हो गया। एक शाम बाबा जालिम सिंह के साथ अपनी मर्सिडीज लेकर सैर पर निकले। वापसी मे जालिम सिंह ने कहा “बाबा मर्सिडीज से उतरो, आज से ये मर्सिडीज हमारी हुई”। बाबा ने उतरते हुए कहा कि “जालिम, ये बात किसी से मत कहना”। दूसरे दिन आश्रम की सीमा ग्रामसभा की सीमा का अतिक्रमण कर रही थी।

कुत्ता

स्साली, ये भी कोई नौकरी है दिन भर धूप मे चौराहे पे खड़े होकर डंडा फटकारते रहो और समय-समय पर वीआईपी गाड़ियों को सैल्यूट ठोंकते रहो। स्साले को, कोई एक्सीडेंट हो जाये तो लाशें ऐसी कि सगे संबंधी भी हाथ रखने मे कतराएं तब उन्हे चादर मे सीकर लाश गिफ्ट करो और पब्लिक है कि हमे कुत्ते से भी बत्तर समझती है। तीन महीने से तनख़ाह नही मिली, टीए-डीए और वर्दी भत्ता तो स्साले ख्वाब है। आज दीवाली है तो हमारे ठेंगे से हम तो आदमी है ही नही, हम तो पुलिस वाले है, न हमारी बीवी है न बच्चे, हमारी कौन सी होली-दीवाली?
-का बे, स्साले चौराहे पे पटाखे की दुकान लगाया है, लाइसेंस लिया है।
-दरोगा जी, ये रखो, कहाँ लाइसेंस के चक्कर मे पड़े हो? दुकानदार ने सौ रुपए का नोट मुट्ठी मे दबा कर उसकी जेब मे ठूंस दिया।
-स्साले, चूंतिया समझते हो हमे, कांस्टेबल को दारोगा कहके चने की झाड़ पे चढ़ा लोगे। फुलझड़ी, अनार, बम और राकेट का एक-एक डिब्बा भी बांध।
कांस्टेबल को थोड़ा आगे बढ़ते ही सुनाई पड़ा ...........हरामखोर..............कुत्ता।

कुत्ता

स्साली, ये भी कोई नौकरी है दिन भर धूप मे चौराहे पे खड़े होकर डंडा फटकारते रहो और समय-समय पर वीआईपी गाड़ियों को सैल्यूट ठोंकते रहो। स्साले को, कोई एक्सीडेंट हो जाये तो लाशें ऐसी कि सगे संबंधी भी हाथ रखने मे कतराएं तब उन्हे चादर मे सीकर लाश गिफ्ट करो और पब्लिक है कि हमे कुत्ते से भी बत्तर समझती है। तीन महीने से तनख़ाह नही मिली, टीए-डीए और वर्दी भत्ता तो स्साले ख्वाब है। आज दीवाली है तो हमारे ठेंगे से हम तो आदमी है ही नही, हम तो पुलिस वाले है, न हमारी बीवी है न बच्चे, हमारी कौन सी होली-दीवाली?
-का बे, स्साले चौराहे पे पटाखे की दुकान लगाया है, लाइसेंस लिया है।
-दरोगा जी, ये रखो, कहाँ लाइसेंस के चक्कर मे पड़े हो? दुकानदार ने सौ रुपए का नोट मुट्ठी मे दबा कर उसकी जेब मे ठूंस दिया।
-स्साले, चूंतिया समझते हो हमे, कांस्टेबल को दारोगा कहके चने की झाड़ पे चढ़ा लोगे। फुलझड़ी, अनार, बम और राकेट का एक-एक डिब्बा भी बांध।
कांस्टेबल को थोड़ा आगे बढ़ते ही सुनाई पड़ा ...........हरामखोर..............कुत्ता।

बाबा भारती की मर्सिडीज

बाबा भारती को अपनी मर्सिडीज से बहुत प्यार था। उनके आश्रम के पड़ोसी गाँव के प्रधान जालिम सिंह की नज़र उनकी मर्सिडीज पर थी। जालिम सिंह विश्वासपात्र अनुयायी बनकर उनका सारथी हो गया। एक शाम बाबा जालिम सिंह के साथ अपनी मर्सिडीज लेकर सैर पर निकले। वापसी मे जालिम सिंह ने कहा “बाबा मर्सिडीज से उतरो, आज से ये मर्सिडीज हमारी हुई”। बाबा ने उतरते हुए कहा कि “जालिम, ये बात किसी से मत कहना”। दूसरे दिन आश्रम की सीमा ग्रामसभा की सीमा का अतिक्रमण कर रही थी।

अट्टालिका

अट्टालिका तैयार हो रही थी। वो किशोर भाई वहाँ दिन मे मजदूरी और रात मे चौकीदारी करते थे। देर शाम को वही पे ईंटों का चूल्हा बनाकर एक भाई रोटियाँ बेलता जाता था और एक सेंकता जाता था। जिस दिन ठेकेदार मजदूरी दे देता था, शाम को रोटी के साथ सब्जी भी बन जाती थी वरना तो प्याज और मिर्च के साथ कुटा नमक ही क्षुधापूर्ति का साधन बनता था। कुछ भी हो लेकिन थे दोनों बहुत संतुष्ट। और एक दिन जब अट्टालिका बनकर बिकने को तैयार हो गई तो लोगो ने दो भाइयों मे जबरदस्त झगड़ा देखा। वे दोनों उस अट्टालिका के मालिक थे।

गुप्ता चाट भंडार

गुप्ता जी ने चाट की अपनी तीसरी दुकान पुरानी दुकानों के बगल मे ही खोली और नाम रखा “असली गुप्ता चाट भंडार”। मैंने पूछा “ ये क्या गुप्ता जी, “गुप्ता चाट भंडार”, “पुराना गुप्ता चाट भंडार” और अब “असली गुप्ता चाट भंडार”? वो बोले “अरे भाई, कभी किसी बड़े मंदिर मे गए है तो वहाँ कितने गणेश जी या बजरंगबली या शिवलिंग पाते है”? मैंने कहा “तीन-चार तो होते ही है”। उन्होने फिर पूछा- किसलिए? मैंने कहा पता नही तो उन्होने बताया कि “अरे कही तो श्रद्धा जागेगी और जेब से पैसा निकलेगा। तो इसीलिए दुकाने मेरी ही है और नाम भी एक जैसा, नाम के चक्कर मे आदमी किसी दुकान पे तो गिरेगा ही”।

असली और नकली

आधुनिक काल मे महाभारत का युद्ध चल रहा था। कर्ण के बाणों ने हाहाकार मचा रखा था। लेकिन सूर्य के दिये हुए कवच और कुंडल के कारण अर्जुन के तीरों का उस पर कोई असर नही हो रहा था। कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण के वेश मे उससे कवच-कुंडल मांगने जाते है। वो कवच-कुंडल दे देता है। बाद मे कृष्ण और अर्जुन देखते है कि कवच और कुंडल पे टैग लगा है “ नकली साबित करने पे एक करोड़ का इनाम”।

खूनी पुरवा

कथावाचक : नाम- श्री शैतान सिंह, पुरवा- खूनी पुरवा , ग्राम- झगड़ गाँव, पोस्ट- बदनामपुरी , तहसील- गदरपुर, जिला- ऊधमसिंह नगर।
नोट- ये कथा कथावाचक ने उसके नाम-पते मे खतरनाक शब्दों के हरबेरियम होने पर उठी मेरी जिज्ञासा को शांत करने के लिए सुनाई थी।
तो लल्लन के दादा अपने खेत मे खुश-खुश खड़े थे सो मेरे बुड्ढे के पेट मे हुड़क उठी। बड़ा खुश दिख रिया है, लुगाई ने आज सुबह-सुबह खाने मे क्या दे दिया? अरे आज खेत मे गन्ना बोऊँ हूँ। बस उसकी खुशी से मेरे बुड्ढे की खोपड़ी सटक गई। गन्ना तो बो लेगा, लेकिन जाएगा किधर को ले के। तेरे खेत की मेड़ से होके ही जावूंगा। अब तक उसकी भी खोपड़ी सटक चुकी थी। ले जा के दिखइयो। ले अभी ले जा के दिखा रिया हूँ। ये देख, मैंने गन्ने बोये और उसने कुछ सीके रोप दी। अब मैंने उन्हे काटा और उन सीकों को उसने उखाड़ दिया। अब मैंने उन्हे अपने ट्रैकटर पर लादा और उसने सीकों को अपनी लाठी पर रख दिया। ये देखो मेरा ट्रैकटर चालू हुआ घ ड़ ड़ और ये पहुंचा तेरी मेड़ पर। और उसकी लाठी ने मेरे खेत की मेड़ छूयी और इधर मेरे बुड्ढे की लाठी उसके सिर पर। फिर तो गाँव मे कई मरे और घायल हुए। तो डागडर बाबू हमारा इलाका तो ऐसी ही कहानियों से भरा पड़ा है। अब तुम ही बोलो हमारा नाम-पता सही है या नही।
(पुनश्च- किसी भी आलोचना से पहले नाम-पते पे फिर गौर फ़रमा ले)

गुरुमंत्र

नए ट्रेनी ऑफिसर ट्रेनिंग की समाप्ति पर अपने-अपने उद्गार व्यक्त कर रहे थे। एक ट्रेनी बोला कि मुझे तो डर लग रहा है कि इतने जटिल नियम-कानूनों के साथ अपनी नौकरी कैसे निभा पाऊँगा। अनुभवी प्रशिक्षक महोदय ने ट्रेनी को ढांढस बँधाया और कहा कि मेरे ये चार नियम गांठ बांध लो फिर नौकरी अपने आप आराम से कट जाएगी।
1- बॉस की इच्छानुसार दो और दो को 0, 4 अथवा 22 बनाने का करतब सीखो।
2- मातहतों के साथ मीटिंग और वरिष्ठों के साथ सिटिंग करने का प्रयास करते रहो।
3- या तो लकड़ी लो या तो लकड़ी दो। लकड़ी लेने मे भलाई नही है, इसलिए लकड़ी देते रहो।
4- अपनी जानकारी मे कीचड़ भी इकट्ठा करते रहो। जब कोई तुम्हारे ऊपर कीचड़ फेके तो तुम भी उसके चेहरे पर कीचड़ मल दो।
ट्रेनी नतमस्तक हो गया।

सहयात्री

बस के माहौल मे बहुत उमस थी। उस पर से बस की धीमी रफ्तार लोगों को बुरी तरह से चिढ़ा रही थी। अचानक दो जवान लड़कों मे सिगरेट को लेकर आपस मे झगड़ा शुरू हो गया। “आपको पता नही बस मे धूम्रपान वर्जित है, सिगरेट फेंकिए”।
“लीजिये फेंक दी, अब चैन पड़ गया”।
सभी लोगों का ध्यान उनकी तरफ मुड गया और लोग अपनी-अपनी खीझ भूलकर उनकी तरफ उत्सुकता से मुखातिब हो गए।
“फेंक दिया तो कोई एहसान नही कर दिया, ये तो गैरकानूनी था ही”।
“बड़े आए कानून सिखाने वाले, खुद तो मुह से शराब की बदबू आ रही है”।
“बस मे पीकर बैठना गैरकानूनी नही है, अगर मैं बस मे पीता तो गैरकानूनी होता”।
“ हुंह! सूप बोले तो बोले, चलनी बोले जिसमे बहत्तर छेद”।
उनकी ऐसी रोचक बातों से लोगों का खासा मनोरंजन हो रहा था और लोग बड़े चाव से उनकी बहस सुन रहे थे। कुछ अतिउत्साही किस्म के लोग तो उनकी बहस मे शामिल भी हो गए। कुछ देर बाद बस का स्टापेज आ गया और वो दोनों जवान लड़के एक दूसरे के गरदन मे बाहें डाल कर हसते हुए बस से बाहर उतर गए।

अन्ना एवं उनके लोकपाल बिल पर आरोप

आजकल अनेकों पत्र-पत्रिकाओं मे अन्ना एवं उनके लोकपाल बिल को लेकर अनेकों संदेह एवं संशय व्यक्त किए जा रहे है। उनमे से कुछ मेरी प्रतिक्रियाओं सहित निम्नवत है:
1- अन्ना का तरीका लोकतन्त्र के खिलाफ है।
अन्ना को मिला व्यापक जनसमर्थन ही इस आरोप का उत्तर है। आज अगर आम आदमी अन्ना के साथ जुड़ रहा है तो इसका मुख्य कारण है कि वह उनके नेतृत्व मे अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है।
2- अन्ना का आमरण अनशन कर अपनी मांगे मनवाना संसदीय वयवस्था के विरुद्ध है। कानून बनाना संसद का काम है।
अन्ना जिस लोकपाल बिल की मांग कर रहे है वो व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है, जिस पर संसद बहुत समय से मौन है। इसलिए आमरण अनशन जैसे शांतिपूर्ण तरीके से स्वहित के लिए नही जनहित के लिए आंदोलन करना गलत नही है। इसको एक सरल उधाहरण से भी समझा जा सकता है। चोर-डकैत को पकड़ना पुलिस का काम है लेकिन यदि गाँव में डकैत आ जाय और पुलिस न हो तो लोगों के द्वारा खुद डकैतों को पकड़ना क्या पुलिस व्यवस्था के विरुद्ध कहलाएगा?
3- राजनेताओं के पास कोई जादुई छड़ी नही है , जिससे वो भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकें।
राजनेताओं के पास कोई न कोई जादू की छड़ी तो अवश्य होती है जिससे वो पाँच वर्ष के कार्यकाल मे ही इतनी संपति एकत्र कर लेते है जितना उनके समकक्ष वेतन पाने वाला व्यक्ति 30-32 वर्ष के सेवाकाल मे भी एकत्र नही कर पाता है। जरूरत है कि इस जादू की छड़ी का प्रयोग भ्रष्टाचार, गरीबी और मंहगाई को दूर करने मे भी किया जाय। वैसे भी भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की दिशा मे चलता है।
4- अन्ना का लोकपाल भी भविष्य में अपने अधिकारों का गलत प्रयोग कर सकता है।
विकास एक सतत प्रक्रिया होती है। कोई भी समाधान चिरकाल तक शाश्वत नही रह सकता। भविष्य मे यदि लोकपाल के क्रिया-कलापों मे शून्यता आएगी तो फिर से गांधी, जे पी अथवा हज़ारे के रूप मे नई जनचेतना जागेगी और उस शून्यता को भर देगी।

5- सिविल सोसाइटी से अभिजात्य वर्ग की बू आती है।
सिविल सोसाइटी से जुड़े लोग पढे- लिखे लोग है और उन्होने जमीनी स्तर पे भी काम करके अपनी पहचान बनाई है। संसदीय व्यवस्था मे भी कई बार पैराशूट-नेता-सदन देखे गये है जिन्होने अच्छे काम भी किए है। तो भी कई बार शातिर किस्म के लोग ऐसे जनांदोलनों से जुड़ कर अपनी ताकत बढ़ा लेते है। ऐसे शातिर लोगों को अपने से दूर रखना भी अन्ना हज़ारे का एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
(ये मेरे अपने निजी विचार है)