स्साली, ये भी कोई नौकरी है दिन भर धूप मे चौराहे पे खड़े होकर डंडा फटकारते रहो और समय-समय पर वीआईपी गाड़ियों को सैल्यूट ठोंकते रहो। स्साले को, कोई एक्सीडेंट हो जाये तो लाशें ऐसी कि सगे संबंधी भी हाथ रखने मे कतराएं तब उन्हे चादर मे सीकर लाश गिफ्ट करो और पब्लिक है कि हमे कुत्ते से भी बत्तर समझती है। तीन महीने से तनख़ाह नही मिली, टीए-डीए और वर्दी भत्ता तो स्साले ख्वाब है। आज दीवाली है तो हमारे ठेंगे से हम तो आदमी है ही नही, हम तो पुलिस वाले है, न हमारी बीवी है न बच्चे, हमारी कौन सी होली-दीवाली?
-का बे, स्साले चौराहे पे पटाखे की दुकान लगाया है, लाइसेंस लिया है।
-दरोगा जी, ये रखो, कहाँ लाइसेंस के चक्कर मे पड़े हो? दुकानदार ने सौ रुपए का नोट मुट्ठी मे दबा कर उसकी जेब मे ठूंस दिया।
-स्साले, चूंतिया समझते हो हमे, कांस्टेबल को दारोगा कहके चने की झाड़ पे चढ़ा लोगे। फुलझड़ी, अनार, बम और राकेट का एक-एक डिब्बा भी बांध।
कांस्टेबल को थोड़ा आगे बढ़ते ही सुनाई पड़ा ...........हरामखोर..............कुत्ता।
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