Monday, October 31, 2011
अब मैं भी बड़ा हो चुका था।
· बारहवीं के बाद घर से बाहर जाकर पढ़ने की ललक उफान पर थी। प्रोफेशनल कॉलेज मे दाखिला भी हो गया। स्टेशन पर परिवार छोडने आया था। घर से बाहर जाने की जो उत्सुकता थी, वो घर से दूर होने की कल्पना से ही व्याकुलता मे बदल चुकी थी। ट्रेन की सीटी बजने पर मैंने पापा का हाथ पकड़ लिया, जिसे पापा ने दूसरे हाथ से थपकाते हुए हौले से छुड़ा लिया। आँखों के कोनों मे नमी उनके भी थी और मेरे भी, लेकिन दोनों चुप थे। शायद अब मैं भी बड़ा हो चुका था।
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