उसे दिल्ली का महज एक कार्यालय कहना उसका अपमान होगा। उसे तो विकास योजनाओं के लिए बहने वाली धनराशि की गंगोत्री कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। तो वहाँ लगभग दस सालों बाद मेरा एक कालेज का सहपाठी मिल गया। हम दोनों के मुह से बेसाख्ता निकाला “ अरे तुम यहाँ”। लेकिन सच बोलूँ तो उसकी रईसी को देखकर मेरे मन मे ईर्ष्या पनप गई थी।
-क्या तुम यही जॉब करते हो?
-नही, मेरा अपना प्रोजेक्ट कन्सेल्टी का काम है, उसी सिलसिले मे यहाँ आया था। पास मे मेरा ऑफिस है, वही चलते है।
-अभी नही, फिर कभी। लेकिन प्रोजेक्ट कन्सेल्टी का मतलब यही हुआ न कि एनजीओ से प्रोजेक्ट पास करवाने का ठेका लेकर यहाँ पर अपनी सेटिंग से प्रोजेक्ट पास करवा देते हो। मैं ईर्ष्यावश कुढ़ कर बोला।
प्रतिउत्तर मे वह सिर्फ मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट का मतलब था मेरा प्रहार खाली गया अतः मैंने दूसरा प्रहार किया “यार दलाली के काम को तुम्हारा जमीर गवारा कैसे करता है”? इस बार शायद मेरा वार काम कर गया था। उसने जवाब दिया “नही, तुम इसे गलत तरीके से सोच रहे हो। यूं समझो कि पराये आदमी की पत्नी की तरफ आँख उठा कर देखना भी पाप है लेकिन अगर वो बहुत बीमार हो जाये तो उसे गोद मे उठा कर भी अस्पताल पहुचाना पुण्य है”।
क्या आप इस दलील से सहमत है?
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