आजकल अनेकों पत्र-पत्रिकाओं मे अन्ना एवं उनके लोकपाल बिल को लेकर अनेकों संदेह एवं संशय व्यक्त किए जा रहे है। उनमे से कुछ मेरी प्रतिक्रियाओं सहित निम्नवत है:
1- अन्ना का तरीका लोकतन्त्र के खिलाफ है।
अन्ना को मिला व्यापक जनसमर्थन ही इस आरोप का उत्तर है। आज अगर आम आदमी अन्ना के साथ जुड़ रहा है तो इसका मुख्य कारण है कि वह उनके नेतृत्व मे अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है।
2- अन्ना का आमरण अनशन कर अपनी मांगे मनवाना संसदीय वयवस्था के विरुद्ध है। कानून बनाना संसद का काम है।
अन्ना जिस लोकपाल बिल की मांग कर रहे है वो व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है, जिस पर संसद बहुत समय से मौन है। इसलिए आमरण अनशन जैसे शांतिपूर्ण तरीके से स्वहित के लिए नही जनहित के लिए आंदोलन करना गलत नही है। इसको एक सरल उधाहरण से भी समझा जा सकता है। चोर-डकैत को पकड़ना पुलिस का काम है लेकिन यदि गाँव में डकैत आ जाय और पुलिस न हो तो लोगों के द्वारा खुद डकैतों को पकड़ना क्या पुलिस व्यवस्था के विरुद्ध कहलाएगा?
3- राजनेताओं के पास कोई जादुई छड़ी नही है , जिससे वो भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकें।
राजनेताओं के पास कोई न कोई जादू की छड़ी तो अवश्य होती है जिससे वो पाँच वर्ष के कार्यकाल मे ही इतनी संपति एकत्र कर लेते है जितना उनके समकक्ष वेतन पाने वाला व्यक्ति 30-32 वर्ष के सेवाकाल मे भी एकत्र नही कर पाता है। जरूरत है कि इस जादू की छड़ी का प्रयोग भ्रष्टाचार, गरीबी और मंहगाई को दूर करने मे भी किया जाय। वैसे भी भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की दिशा मे चलता है।
4- अन्ना का लोकपाल भी भविष्य में अपने अधिकारों का गलत प्रयोग कर सकता है।
विकास एक सतत प्रक्रिया होती है। कोई भी समाधान चिरकाल तक शाश्वत नही रह सकता। भविष्य मे यदि लोकपाल के क्रिया-कलापों मे शून्यता आएगी तो फिर से गांधी, जे पी अथवा हज़ारे के रूप मे नई जनचेतना जागेगी और उस शून्यता को भर देगी।
5- सिविल सोसाइटी से अभिजात्य वर्ग की बू आती है।
सिविल सोसाइटी से जुड़े लोग पढे- लिखे लोग है और उन्होने जमीनी स्तर पे भी काम करके अपनी पहचान बनाई है। संसदीय व्यवस्था मे भी कई बार पैराशूट-नेता-सदन देखे गये है जिन्होने अच्छे काम भी किए है। तो भी कई बार शातिर किस्म के लोग ऐसे जनांदोलनों से जुड़ कर अपनी ताकत बढ़ा लेते है। ऐसे शातिर लोगों को अपने से दूर रखना भी अन्ना हज़ारे का एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
(ये मेरे अपने निजी विचार है)
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