Monday, October 31, 2011

फेरी वाली

ब्बाभी जी, चादरें ल्लोगी।
-न बेटा, नही चाहिए।
-देख तो ल्लों, ल्लेना न ल्लेना तो बाद की बात है।
-अरे जब मुझे लेनी ही नही है तो क्यों अपना समय बर्बाद करोगी।
-मेरा तो काम ही है लोगों को चादरें दिखाना। कछ-भुज की चादरें है, आप भी देख लो, अब तो त्योहारों का मौसम भी आ रहा है।
-ये वाली चादर कैसे है?
-ब्बाभी जी ये तो चादर और सोफ़ा-कवर का पूरा सेट है, आप के कमरे मे बहुत फबेगा, एक दाम बोल्लूंगी 2500 रुपये।
-न बेटा ये तो बहुत ज्यादा है।
- अच्छा बोल्लों आप क्या बोलती हो इसके?
-1000 रुपए।
-ये क्या ब्बाभी जी? मेरे सर की कसम, 2200 की खरीद है, 300 तो इतनी धूप मे दौड़-धूप के बाद बचना ही च्चाहिए न।
-नही, नही 1000 बिलकुल ठीक बोल रही हूँ।
-ब्बाभी बोहनी का वक्त है, इसलिए आपको चादर देनी ही है। पहला गाहक भगवान होता है इसलिए आपके यहाँ से खाली नही लौटूंगी। एक दाम 1500, बोल्लों आप क्या बोलती हो?
-बस 1200, इससे ज्यादा एक पैसा नही।
-चलो ब्बाभी दो, बोहनी के समय है, आपको नर्राज़ नही कर सकती।
भाभी जी 700-800 का सेट 1200 मे खरीद कर इतरा रही थी और वो सधी हुई गुजरातन व्यापारी नए ग्राहक को खोजने चल पड़ी थी।

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