Monday, October 31, 2011
मैं अन्ना के खिलाफ हूँ।
मैं अन्ना के खिलाफ हूँ कि क्योंकि उनकी मांगे हमारे खिलाफ हैं। वो कहते हैं “भ्रष्टाचार खत्म करो”। मैं कहता हूँ कि इतने सालों में भ्रष्टाचार का एक सिस्टम पैदा हुआ है जो आज जमाने में शिष्टाचार का रूप ले चुका है, सबका पर्सेंटेज फिक्स हुआ है, सबका धंधा ईमानदारी से चल रहा है। अब वक्त की जरूरत है कि एक कदम आगे जाकर भ्रष्टाचार को वैधानिक करने का अर्थात रेट लिस्ट तय हो जाय कि किस काम के लिए कितनी रिश्वत किसको देय होगी, न कि वापस गांधी जी के समय में जाकर भ्रष्टाचार के सिस्टम को नष्ट करने की कोशिश करते हुए देश में अराजकता फैलाई जाय।क्रिकेट की टीम इंडिया के खेल में तो स्थिरता है नही, कम से कम राजनीति के खेल मे तो स्थिरता है। कुछ समय संप्रग तो कुछ समय राजग , दोनों मिल कर देश मंथन का खेल खेल रहे है और रत्न आपस मे बाँट रहे है। रही बात हलाहल कि तो ये तो सवा अरब भोलों का देश है, अपने-अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा पी लेंगे, बात फिनिश। अन्ना का वश चले तो इस खेल का मज़ा भी भंग कर दें। अन्ना एंड पार्टी तो मानती नही कि राजा भगवान के समान होता है। वो हमारे राजा साहेबो से सुधरने कि मांग कर रहे है और राजा साहेब फरमा रहे है कि जब तक देश का अंतिम व्यक्ति नही सुधरता, उनसे सुधरने की मांग असंवैधानिक है। अन्ना चाहते है कि उनके द्वारा तैयार लोकपाल विधेयक लागू किया जाय। अब जब अन्ना जैसे गैर संसदीय लोग कानून बनाएँगे तो माननीय सांसद साहेबान संसद में गन्ना छीलेंगे क्या? अब तो कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे दूरदर्शी और दूर की कौड़ी खोज कर लाने वाले नेताओं को चाहिए कि वो अन्ना एंड पार्टी द्वारा चलाये जा रहे दुष्प्रचार को आई एस आई से लिंक करते हुए उनको देश में अराजकता फैलाने के आरोप में तिहाड़ के पीछे करें।
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