- भाई, ये गोरखपुर कौन-कौन सी ट्रेन जाती है...................?
- मुझे नही पता..................। इन्क्वायरी पर पूछ लो.....................।
- इन्क्वायरी पे तो इतनी भीड़ है, किससे पूछूँ.........................?
- उधर टाइम-टेबल से देख लीजिए................।
- .................................
- ................................
- भाई ये हावड़ा एक्सप्रेस गोरखपुर कब पहुँचती होगी.............................?
- मुझे क्या पता............................।
- अच्छा, यहाँ से तो समय से ही छूटती होगी.....................?
- अरे मुझे क्या मालूम, क्या मैं रेलवे इन्क्वायरी हूँ?
- तो इतना चिड़चिड़ा क्यूँ रहे हो? कह दो मुझे नही मालूम………………।
- तो इतनी देर से क्या कह रहा हूँ?
- अजीब बेमरौव्वत आदमी हो। आजकल तो किसी से बोलना भी दुश्वार है.................।
- अरे मुझे मालूम है, यहाँ लोग बातों मे ही उलझा कर जेब काट लेते है......... ।
- क्या तुम्हें मैं जेबकतरा लगता हूँ........................?
- क्या किसी के चेहरे पे चिपका है कि वो शरीफ है.................?
- वो तो तुम्हारे चेहरे पे भी नही चिपका है कि तुम जेबकतरे नही हो...............।
जेबकतरा! जेबकतरा! टन! टन! आस-पास लाइनों मे लगे लोगो का अवचेतन मन सक्रिय हुआ और हाथ खुद ब खुद अपनी-अपनी भारी जेबों पर चला गया। इस दृश्य को कुछ जोड़ी आंखो ने स्कैन कर लिया और एक –दो जेबें उस रेलमपेल मे साफ हो गईं। शाम को वो दोनों अपना रिज़र्वेशन कैंसल कराने फिर लाइन मे लगे थे।
Sunday, October 30, 2011
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