Sunday, October 30, 2011

अट्टालिका

अट्टालिका तैयार हो रही थी। वो किशोर भाई वहाँ दिन मे मजदूरी और रात मे चौकीदारी करते थे। देर शाम को वही पे ईंटों का चूल्हा बनाकर एक भाई रोटियाँ बेलता जाता था और एक सेंकता जाता था। जिस दिन ठेकेदार मजदूरी दे देता था, शाम को रोटी के साथ सब्जी भी बन जाती थी वरना तो प्याज और मिर्च के साथ कुटा नमक ही क्षुधापूर्ति का साधन बनता था। कुछ भी हो लेकिन थे दोनों बहुत संतुष्ट। और एक दिन जब अट्टालिका बनकर बिकने को तैयार हो गई तो लोगो ने दो भाइयों मे जबरदस्त झगड़ा देखा। वे दोनों उस अट्टालिका के मालिक थे।

गुप्ता चाट भंडार

गुप्ता जी ने चाट की अपनी तीसरी दुकान पुरानी दुकानों के बगल मे ही खोली और नाम रखा “असली गुप्ता चाट भंडार”। मैंने पूछा “ ये क्या गुप्ता जी, “गुप्ता चाट भंडार”, “पुराना गुप्ता चाट भंडार” और अब “असली गुप्ता चाट भंडार”? वो बोले “अरे भाई, कभी किसी बड़े मंदिर मे गए है तो वहाँ कितने गणेश जी या बजरंगबली या शिवलिंग पाते है”? मैंने कहा “तीन-चार तो होते ही है”। उन्होने फिर पूछा- किसलिए? मैंने कहा पता नही तो उन्होने बताया कि “अरे कही तो श्रद्धा जागेगी और जेब से पैसा निकलेगा। तो इसीलिए दुकाने मेरी ही है और नाम भी एक जैसा, नाम के चक्कर मे आदमी किसी दुकान पे तो गिरेगा ही”।

असली और नकली

आधुनिक काल मे महाभारत का युद्ध चल रहा था। कर्ण के बाणों ने हाहाकार मचा रखा था। लेकिन सूर्य के दिये हुए कवच और कुंडल के कारण अर्जुन के तीरों का उस पर कोई असर नही हो रहा था। कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण के वेश मे उससे कवच-कुंडल मांगने जाते है। वो कवच-कुंडल दे देता है। बाद मे कृष्ण और अर्जुन देखते है कि कवच और कुंडल पे टैग लगा है “ नकली साबित करने पे एक करोड़ का इनाम”।

खूनी पुरवा

कथावाचक : नाम- श्री शैतान सिंह, पुरवा- खूनी पुरवा , ग्राम- झगड़ गाँव, पोस्ट- बदनामपुरी , तहसील- गदरपुर, जिला- ऊधमसिंह नगर।
नोट- ये कथा कथावाचक ने उसके नाम-पते मे खतरनाक शब्दों के हरबेरियम होने पर उठी मेरी जिज्ञासा को शांत करने के लिए सुनाई थी।
तो लल्लन के दादा अपने खेत मे खुश-खुश खड़े थे सो मेरे बुड्ढे के पेट मे हुड़क उठी। बड़ा खुश दिख रिया है, लुगाई ने आज सुबह-सुबह खाने मे क्या दे दिया? अरे आज खेत मे गन्ना बोऊँ हूँ। बस उसकी खुशी से मेरे बुड्ढे की खोपड़ी सटक गई। गन्ना तो बो लेगा, लेकिन जाएगा किधर को ले के। तेरे खेत की मेड़ से होके ही जावूंगा। अब तक उसकी भी खोपड़ी सटक चुकी थी। ले जा के दिखइयो। ले अभी ले जा के दिखा रिया हूँ। ये देख, मैंने गन्ने बोये और उसने कुछ सीके रोप दी। अब मैंने उन्हे काटा और उन सीकों को उसने उखाड़ दिया। अब मैंने उन्हे अपने ट्रैकटर पर लादा और उसने सीकों को अपनी लाठी पर रख दिया। ये देखो मेरा ट्रैकटर चालू हुआ घ ड़ ड़ और ये पहुंचा तेरी मेड़ पर। और उसकी लाठी ने मेरे खेत की मेड़ छूयी और इधर मेरे बुड्ढे की लाठी उसके सिर पर। फिर तो गाँव मे कई मरे और घायल हुए। तो डागडर बाबू हमारा इलाका तो ऐसी ही कहानियों से भरा पड़ा है। अब तुम ही बोलो हमारा नाम-पता सही है या नही।
(पुनश्च- किसी भी आलोचना से पहले नाम-पते पे फिर गौर फ़रमा ले)

गुरुमंत्र

नए ट्रेनी ऑफिसर ट्रेनिंग की समाप्ति पर अपने-अपने उद्गार व्यक्त कर रहे थे। एक ट्रेनी बोला कि मुझे तो डर लग रहा है कि इतने जटिल नियम-कानूनों के साथ अपनी नौकरी कैसे निभा पाऊँगा। अनुभवी प्रशिक्षक महोदय ने ट्रेनी को ढांढस बँधाया और कहा कि मेरे ये चार नियम गांठ बांध लो फिर नौकरी अपने आप आराम से कट जाएगी।
1- बॉस की इच्छानुसार दो और दो को 0, 4 अथवा 22 बनाने का करतब सीखो।
2- मातहतों के साथ मीटिंग और वरिष्ठों के साथ सिटिंग करने का प्रयास करते रहो।
3- या तो लकड़ी लो या तो लकड़ी दो। लकड़ी लेने मे भलाई नही है, इसलिए लकड़ी देते रहो।
4- अपनी जानकारी मे कीचड़ भी इकट्ठा करते रहो। जब कोई तुम्हारे ऊपर कीचड़ फेके तो तुम भी उसके चेहरे पर कीचड़ मल दो।
ट्रेनी नतमस्तक हो गया।

सहयात्री

बस के माहौल मे बहुत उमस थी। उस पर से बस की धीमी रफ्तार लोगों को बुरी तरह से चिढ़ा रही थी। अचानक दो जवान लड़कों मे सिगरेट को लेकर आपस मे झगड़ा शुरू हो गया। “आपको पता नही बस मे धूम्रपान वर्जित है, सिगरेट फेंकिए”।
“लीजिये फेंक दी, अब चैन पड़ गया”।
सभी लोगों का ध्यान उनकी तरफ मुड गया और लोग अपनी-अपनी खीझ भूलकर उनकी तरफ उत्सुकता से मुखातिब हो गए।
“फेंक दिया तो कोई एहसान नही कर दिया, ये तो गैरकानूनी था ही”।
“बड़े आए कानून सिखाने वाले, खुद तो मुह से शराब की बदबू आ रही है”।
“बस मे पीकर बैठना गैरकानूनी नही है, अगर मैं बस मे पीता तो गैरकानूनी होता”।
“ हुंह! सूप बोले तो बोले, चलनी बोले जिसमे बहत्तर छेद”।
उनकी ऐसी रोचक बातों से लोगों का खासा मनोरंजन हो रहा था और लोग बड़े चाव से उनकी बहस सुन रहे थे। कुछ अतिउत्साही किस्म के लोग तो उनकी बहस मे शामिल भी हो गए। कुछ देर बाद बस का स्टापेज आ गया और वो दोनों जवान लड़के एक दूसरे के गरदन मे बाहें डाल कर हसते हुए बस से बाहर उतर गए।

अन्ना एवं उनके लोकपाल बिल पर आरोप

आजकल अनेकों पत्र-पत्रिकाओं मे अन्ना एवं उनके लोकपाल बिल को लेकर अनेकों संदेह एवं संशय व्यक्त किए जा रहे है। उनमे से कुछ मेरी प्रतिक्रियाओं सहित निम्नवत है:
1- अन्ना का तरीका लोकतन्त्र के खिलाफ है।
अन्ना को मिला व्यापक जनसमर्थन ही इस आरोप का उत्तर है। आज अगर आम आदमी अन्ना के साथ जुड़ रहा है तो इसका मुख्य कारण है कि वह उनके नेतृत्व मे अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है।
2- अन्ना का आमरण अनशन कर अपनी मांगे मनवाना संसदीय वयवस्था के विरुद्ध है। कानून बनाना संसद का काम है।
अन्ना जिस लोकपाल बिल की मांग कर रहे है वो व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है, जिस पर संसद बहुत समय से मौन है। इसलिए आमरण अनशन जैसे शांतिपूर्ण तरीके से स्वहित के लिए नही जनहित के लिए आंदोलन करना गलत नही है। इसको एक सरल उधाहरण से भी समझा जा सकता है। चोर-डकैत को पकड़ना पुलिस का काम है लेकिन यदि गाँव में डकैत आ जाय और पुलिस न हो तो लोगों के द्वारा खुद डकैतों को पकड़ना क्या पुलिस व्यवस्था के विरुद्ध कहलाएगा?
3- राजनेताओं के पास कोई जादुई छड़ी नही है , जिससे वो भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकें।
राजनेताओं के पास कोई न कोई जादू की छड़ी तो अवश्य होती है जिससे वो पाँच वर्ष के कार्यकाल मे ही इतनी संपति एकत्र कर लेते है जितना उनके समकक्ष वेतन पाने वाला व्यक्ति 30-32 वर्ष के सेवाकाल मे भी एकत्र नही कर पाता है। जरूरत है कि इस जादू की छड़ी का प्रयोग भ्रष्टाचार, गरीबी और मंहगाई को दूर करने मे भी किया जाय। वैसे भी भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की दिशा मे चलता है।
4- अन्ना का लोकपाल भी भविष्य में अपने अधिकारों का गलत प्रयोग कर सकता है।
विकास एक सतत प्रक्रिया होती है। कोई भी समाधान चिरकाल तक शाश्वत नही रह सकता। भविष्य मे यदि लोकपाल के क्रिया-कलापों मे शून्यता आएगी तो फिर से गांधी, जे पी अथवा हज़ारे के रूप मे नई जनचेतना जागेगी और उस शून्यता को भर देगी।

5- सिविल सोसाइटी से अभिजात्य वर्ग की बू आती है।
सिविल सोसाइटी से जुड़े लोग पढे- लिखे लोग है और उन्होने जमीनी स्तर पे भी काम करके अपनी पहचान बनाई है। संसदीय व्यवस्था मे भी कई बार पैराशूट-नेता-सदन देखे गये है जिन्होने अच्छे काम भी किए है। तो भी कई बार शातिर किस्म के लोग ऐसे जनांदोलनों से जुड़ कर अपनी ताकत बढ़ा लेते है। ऐसे शातिर लोगों को अपने से दूर रखना भी अन्ना हज़ारे का एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
(ये मेरे अपने निजी विचार है)