Sunday, November 6, 2011
फ़ाइल
तो सरकार ने पाया कि देश मे बढ़िया दूध देने वाले जानवर बहुत कम रह गए हैं। जानकार लोग सर से सर लड़ाकर बैठे तो हल निकला कि दूसरे देशों से अच्छे दूध देने वाले जानवर मंगाए जाये। फाइलें एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय मे दौड़ने लगीं तो मालूम हुआ कि सरकार ने ही विदेश से जानवर मंगाने पे बैन लगाया हुआ है। जानकार लोग फिर सर से सर लड़ाकर बैठे तो हल निकला कि सरकार से इस बैन को हटवाया जाय। फाइलें फिर एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय मे दौडीं तो आंशिक छूट मिली कि पैदा हो चुके जानवर तो नही आ सकते लेकिन भ्रूण और सीमेन आयात किया जा सकता है। तो विदेश से भ्रूण और सीमेन आयात किए जाने के लिए सरकारी खरीद प्रक्रिया शुरू हुई। टेंडर ग्लोबल स्तर पर जारी हो गए और फाइलें फिर से एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय मे दौड़ने लगीं। एक विदेशी कंपनी ने इस खरीद-फरोख्त मे मोटी मलाई को देखकर महेंद्र चौधरी नामक होनहार एम बी ए युवक को भारत मे अपना एजेंट नियुक्त कर दिया। अब महेंद्र चौधरी भी फाइलों के साथ एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय के बीच दौड़ने लगे। साइड-बाई-साइड महेंद्र चौधरी के पारिवारिक जीवन मे भी एक कहानी की शुरुवात हो चुकी थी और वो ये कि उनकी धर्मपत्नी उम्मीद से हो गई थी। तो समय के साथ-साथ फाइलें दौड़ती रही और उनकी पत्नी का भी प्रसव-काल नजदीक आता गया। फिर एक दिन ऐसा आया कि वो टेंडर निरस्त हो गया और उसी दिन उनकी पत्नी ने एक पुत्र-रत्न को जन्म दिया। महेंद्र चौधरी की ऐसी निराशा भरी अवस्था मे ही उनकी पत्नी ने बड़े प्यार से पूछा कि बेटे का नाम क्या रखोगे जी? महेंद्र चौधरी ने लगभग खामोशी से ही जवाब दिया “टेंडर चौधरी”।
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