· 44-Homo sapiens sapiens वो प्रौढ़ विधुर पक्षाघात की स्थिति से गुजर रहा था। सुबह जब सब लड़के अपने- अपने दफ्तर चले जाते थे तब उससे जीवन की एकरसता और खालीपन काटा नही जाता था। उसने ठीक होते ही बिना बच्चो को बताए क्लासीफाइड़ मे विज्ञापन दिया “ आवश्यकता है एक 35- 40 वर्ष की विधवा निःसंतान जीवनसंगिनी की की, जाति- धर्म का कोई बंधन नही”। 3-4 विकल्पों मे से उसने एक क्रिश्चियन महिला को चुना और तीर्थयात्रा के बहाने दूसरे शहर मे रहने चला गया। उसने नई पत्नी के पुराने घर को बिकवा कर संयुक्त नाम से एक घर खरीदा और खुशी- खुशी रहने लगा। कुछ दिनो बाद पत्नी के पैसों से घर चलाने के बाद एक दुकान भी पत्नी के फंड के मिले पैसों से खरीद ली। दुकान चल निकली। अब तक उसके लड़को को भी ये सारी बातें पता चल गई थी। अब लड़के भी जब – तब यहाँ आने लगे थे। उसका पुत्र- प्रपौत्र मोह फिर जाग गया था। एक दिन वो चलती दुकान अच्छे मुनाफे मे बेचकर पुत्रों- प्रपौत्रों के साथ रहने फिर चला गया था। वो क्रिश्चियन महिला फिर से विधवा हो गई थी।
· 45-वो अपने बच्चे के बर्थडे के लिए मेहमानो की लिस्ट बना रहा था। सहूलियत के लिये उसने अपनी डायरी खोल ली जिसमे उसने नोट कर रखा था कि वो किस-किस की पार्टी मे गया है और क्या-क्या दिया है तथा उसके घर पर आयोजित पार्टी मे किसने क्या-क्या दिया है?
· बस के माहौल मे बहुत उमस थी। उस पर से बस की धीमी रफ्तार लोगों को बुरी तरह से चिढ़ा रही थी। अचानक दो जवान लड़कों मे सिगरेट को लेकर आपस मे झगड़ा शुरू हो गया। “आपको पता नही बस मे धूम्रपान वर्जित है, सिगरेट फेंकिए”। “लीजिये फेंक दी, अब चैन पड़ गया”।सभी लोगों का ध्यान उनकी तरफ मुड गया और लोग अपनी-अपनी खीझ भूलकर उनकी तरफ उत्सुकता से मुखातिब हो गए। “फेंक दिया तो कोई एहसान नही कर दिया, ये तो गैरकानूनी था ही”।“बड़े आए कानून सिखाने वाले, खुद तो मुह से शराब की बदबू आ रही है”।“बस मे पीकर बैठना गैरकानूनी नही है, अगर मैं बस मे पीता तो गैरकानूनी होता”।“ हुंह! सूप बोले तो बोले, चलनी बोले जिसमे बहत्तर छेद”। उनकी ऐसी रोचक बातों से लोगों का खासा मनोरंजन हो रहा था और लोग बड़े चाव से उनकी बहस सुन रहे थे। कुछ अतिउत्साही किस्म के लोग तो उनकी बहस मे शामिल भी हो गए। कुछ देर बाद बस का स्टापेज आ गया और वो दोनों जवान लड़के एक दूसरे के गरदन मे बाहें डाल कर हसते हुए बस से बाहर उतर गए।
· 46-अब शादी-विवाह जैसे समारोहों मे कपड़े-जेवर खरीदने के सिवा कोई खास काम तो होता नही है इसलिए लोग बढ़िया से ऐसे समारोह एंजॉय करते है। सो उस शादी मे भी रिश्तेदार-नातेदार अलग-अलग ग्रुप मे बैठ कर चकल्लस कर रहे थे। एक तरफ बहुओं का ग्रुप बैठा चिट्स के माध्यम से बड़ा मनभावन खेल खेल रहा था और रह-रह कर आवाज आ रही थी “हाय ये कितनी लकी है न”। खेल था- “किसकी सास पहले उठेगी”।
कथावाचक : नाम- श्री शैतान सिंह, पुरवा- खूनी पुरवा , ग्राम- झगड़ गाँव, पोस्ट- बदनामपुरी , तहसील- गदरपुर, जिला- ऊधमसिंह नगर। (नोट- ये कथा कथावाचक ने उसके नाम-पते मे खतरनाक शब्दों के हरबेरियम होने पर उठी मेरी जिज्ञासा को शांत करने के लिए सुनाई थी।)तो लल्लन के दादा अपने खेत मे खुश-खुश खड़े थे सो मेरे बुड्ढे के पेट मे हुड़क उठी। बड़ा खुश दिख रिया है, लुगाई ने आज सुबह-सुबह खाने मे क्या दे दिया? अरे आज खेत मे गन्ना बोऊँ हूँ। बस उसकी खुशी से मेरे बुड्ढे की खोपड़ी सटक गई। गन्ना तो बो लेगा, लेकिन जाएगा किधर को ले के। तेरे खेत की मेड़ से होके ही जावूंगा। अब तक उसकी भी खोपड़ी सटक चुकी थी। ले जा के दिखइयो। ले अभी ले जा के दिखा रिया हूँ। ये देख, मैंने गन्ने बोये और उसने कुछ सीके रोप दी। अब मैंने उन्हे काटा और उन सीकों को उसने उखाड़ दिया। अब मैंने उन्हे अपने ट्रैकटर पर लादा और उसने सीकों को अपनी लाठी पर रख दिया। ये देखो मेरा ट्रैकटर चालू हुआ घ ड़ ड़ और ये पहुंचा तेरी मेड़ पर। उधर उसकी लाठी मेरे खेत की मेड़ छूयी और इधर मेरे बुड्ढे की लाठी उसके सिर पर। फिर तो गाँव मे कई मरे और घायल हुए। तो बाबू हमारा इलाका तो ऐसी ही कहानियों से भरा पड़ा है। अब तुम ही बोलो हमारा नाम-पता सही है या नही। (पुनश्च पते पे फिर गौर फ़रमा ले - किसी भी आलोचना से पहले नाम -)
· गुरुमंत्र नए ट्रेनी ऑफिसर ट्रेनिंग की समाप्ति पर अपने-अपने उद्गार व्यक्त कर रहे थे। एक ट्रेनी बोला कि मुझे तो डर लग रहा है कि इतने जटिल नियम-कानूनों के साथ अपनी नौकरी कैसे निभा पाऊँगा। अनुभवी प्रशिक्षक महोदय ने ट्रेनी को ढांढस बँधाया और कहा कि मेरे ये चार नियम गांठ बांध लो फिर नौकरी अपने आप आराम से कट जाएगी। 1-बॉस की इच्छानुसार दो और दो को 0, 4 अथवा 22 बनाने का करतब सीखो। 2-मातहतों के साथ मीटिंग और वरिष्ठों के साथ सिटिंग करने का प्रयास करते रहो।3-या तो लकड़ी लो या तो लकड़ी दो। लकड़ी लेने मे भलाई नही है, इसलिए लकड़ी देते रहो।4-अपनी जानकारी मे कीचड़ भी इकट्ठा करते रहो। जब कोई तुम्हारे ऊपर कीचड़ फेके तो तुम भी उसके चेहरे पर कीचड़ मल दो।ट्रेनी नतमस्तक हो गया।
· गुप्ता जी ने चाट की अपनी तीसरी दुकान पुरानी दुकानों के बगल मे ही खोली और नाम रखा “असली गुप्ता चाट भंडार”। मैंने पूछा “ ये क्या गुप्ता जी, “गुप्ता चाट भंडार”, “पुराना गुप्ता चाट भंडार” और अब “असली गुप्ता चाट भंडार”? वो बोले “अरे भाई, कभी किसी बड़े मंदिर मे गए है तो वहाँ कितने गणेश जी या बजरंगबली या शिवलिंग पाते है”? मैंने कहा “तीन-चार तो होते ही है”। उन्होने फिर पूछा- किसलिए? मैंने कहा पता नही तो उन्होने बताया कि “अरे कही तो श्रद्धा जागेगी और जेब से पैसा निकलेगा। तो इसीलिए दुकाने मेरी ही है और नाम भी एक जैसा, नाम के चक्कर मे आदमी किसी दुकान पे तो गिरेगा ही”।
· आधुनिक काल मे महाभारत का युद्ध चल रहा था। कर्ण के बाणों ने हाहाकार मचा रखा था। लेकिन सूर्य के दिये हुए कवच और कुंडल के कारण अर्जुन के तीरों का उस पर कोई असर नही हो रहा था। कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण के वेश मे उससे कवच-कुंडल मांगने जाते है। वो कवच-कुंडल दे देता है। बाद मे कृष्ण और अर्जुन देखते है कि कवच और कुंडल पे टैग लगा है “ नकली साबित करने पे एक करोड़ का इनाम”।
· अट्टालिका तैयार हो रही थी। वो किशोर भाई वहाँ दिन मे मजदूरी और रात मे चौकीदारी करते थे। देर शाम को वही पे ईंटों का चूल्हा बनाकर एक भाई रोटियाँ बेलता जाता था और एक सेंकता जाता था। जिस दिन ठेकेदार मजदूरी दे देता था, शाम को रोटी के साथ सब्जी भी बन जाती थी वरना तो प्याज और मिर्च के साथ कुटा नमक ही क्षुधापूर्ति का साधन बनता था। कुछ भी हो लेकिन थे दोनों बहुत संतुष्ट। और एक दिन जब अट्टालिका बनकर बिकने को तैयार हो गई तो लोगो ने दो भाइयों मे जबरदस्त झगड़ा देखा। वे दोनों उस अट्टालिका के मालिक थे।
· 47-इंद्रप्रस्थ मे अन्ना की रैली देखने युधिष्ठिर भी पहुंचे। कुछ देर बाद गला प्यास से सूखने लगा तो पास के नल पर पहुंचे। नल खोला तो सूं सूं की आवाज के बाद एक कीड़ा नल से टपका और देखते ही देखते एक यक्ष मे तब्दील हो गया। यक्ष ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक युधिष्ठिर से प्रश्न पूछा " हे युधिष्ठिर! इस रैली के बाद फिर से कौन छला जाएगा? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया हे यक्ष! इस बार फिर जनता ही छली जाएगी। यक्ष ने फिर प्रश्न पूछा "तो युधिष्ठिर इस भारत भूमि पर फिर कौन राज करेगा? युधिष्ठिर ने जवाब दिया " हे यक्ष! इस भारत भूमि पर राजपरिवार की अगली पीढ़ी ही हज़ारे उपनाम लगा कर राज करेगी। नल से पानी शर्मसार होकर बहने लगा था।
48-एक रहिन अत्तते, एक रहिन फत्ते और एक रहिन हम,
अत्तते कहिन चलो ऑफिस हो आई, फत्ते कहिन चलो ऑफिस हो आई, हम कहा चलौ हमहू ऑफिस हौ आई।
अत्तते गए फ्लीट से, फत्ते गए फ्लीट से, हम गयन 13 नंबर की बस से।
अत्तते कहिन चलौ लौंडे कै नाम लिखा आई, फत्ते कहिन चलौ लौंडे कै नाम लिखा आई, हम कहा चलौ हमहू लौंडे कै नाम लिखा आई।
अत्तते गए स्विट्जरलैंड, फत्ते गए इंग्लैंड, हम गयन सरकारी पाठशाला।
अत्तते कहिन चलौ आउटिंग कै आई, फत्ते कहिन चलौ आउटिंग कै आई, हम कहा चलौ हमहू आउटिंग कै आई।
अत्तते गए अशोका होटल, फत्ते गए ताज होटल, हम पहुचैन काके दी ढाबा।
अत्तते कहिन चलौ आपन संपत्ती कै खुलासा करी, फत्ते कहिन चलौ आपन संपत्ती कै खुलासा करी, हम कहा चलौ हमहू आपन संपत्ती कै खुलासा करी।
अत्तते के पास लाख रूपिया और मारुति कार, फत्ते के पास लाख रूपिया और अंबेसडर कार, हमरे पास दुई लाख और महिंद्रा का ट्रैक्टर।
अत्तते कहिन ई माया है, फत्ते कहिन ई माया है, हम कहा हमही का बुडबक बनावट ह्या?
Sunday, November 6, 2011
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