Sunday, November 6, 2011

· 42-दो कम-बधिरों का वार्तालाप:चैत की खुशनुमा सुबह थी। मेरे ताऊ जी महुआ बीन रहे थे। उधर से उनके बाल सखा गनेशी भी आ गए। गनेशी: राम राम जयलाल. सुबह- सुबह महुआ बीनत हौ।ताऊ जी: नाही गनेशी, महुआ बीनत हई।गनेशी: चलौ बढ़िया हई, हम जानेंन कि महुआ बीनत हौ।

· 43-एक जंगल मे तीन दोस्त थे। बंदर, गधा और खरगोश। तीनों राजा शेर के दरबार मे ही दरबारी थे। यूं तो तीनों दोस्त थे लेकिन स्वभाव मे बड़ी भिन्नता थी। गधा गधे की तरह दिन भर काम मे जुटा रहता था। लेकिन बोलना उसे न आता था। इसलिए सारे दरबार का भार उसके कंधे पर ही रहता था। कोई लाभ भी नही मिलता था, इसलिए दुखी बहुत रहता था। बंदर काम-धाम कुछ न करता था, करता था तो सिर्फ मौज या राजा की चापलूसी। राजा की चापलूसी के कारण उसे लाभ भी मिलते थे। तीसरा था खरगोश न ज्यादा काम करता था न ही राजा की चापलूसी लेकिन राजा के विरुद्ध रहता हो ऐसा भी नही था। हा अनुभवी बहुत था इसलिए राजा जब भी मुश्किल मे रहता था उसे याद जरूर करता था। वो भी अपनी स्थिति से संतुष्ट रहता था। एक दिन गधे ने खरगोश से अपने मन की व्यथा कही तो खरगोश ने कहा तुम भी चापलूसी शुरू कर दो, मौज मे रहोगे तो गधे ने कहा लेकिन मुझे बोलना तो आता ही नही तो खरगोश ने कहा अपने काम मे छोटी- छोटी गलतियाँ करनी शुरू कर दो, फिर कम से कम काम मिलेगा। कुछ दिनों बाद गधा भी संतुष्ट रहने लगा।

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