Sunday, November 6, 2011

बात करीब 15 साल पुरानी है जब जानवरों मे कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम पशुपालकों के बीच अपनी पैठ बना चुका था और भ्रूण प्रत्यारोपण कार्यक्रम भारत मे नया-नया पाँव पसार रहा था। (इन शब्दावलियों से अनजान शहरी मध्यमवर्ग के पाठको को ये बताना उचित होगा कि ये दोनों कार्यक्रम दुधारू पशुओ के नस्ल सुधार योजना से जुड़े हुए है। जहां कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम एक सरल प्रक्रिया है, जिसमे उन्नत नस्ल के सांड के शुक्राणुओं के प्रयोग से गाये गर्भित की जाती है और ये सुविधा लगभग हर पशुचिकित्सालय पे उपलब्ध है, वहीं भ्रूण प्रत्यारोपण कार्यक्रम आधुनिक संस्थानों तक सीमित एक जटिल कार्यक्रम है जिसमे उन्नत नस्ल के सांड और उन्नत नस्ल की गाय से एक बार मे ही कई भ्रूण प्राप्त कर अलग-अलग गायों मे प्रत्यारोपित किए जाते है।)
तो एक सरदार जी अपनी गाय लेकर पशुचिकित्सालय पहुंचे जहां डॉ चतुर सिंह (नाम काल्पनिक है) अपनी तीन पाँव की कुर्सी को चार-छह ईंटों की मीनार से टिकाए हुए नीम के पेड़ के तले बैठे हुए थे।
-हाँ जी पापे जी कैसे आणा हुआ?
-डॉ साहब, गाय कल शाम से बोल रही है, हरी कर दो।
डॉ चतुर सिंह ने गाय के प्रजनन अंग जाँचे तो पाया कि गाय तो पहले से ही तीन-साढ़े तीन महीने की गाभिन है। चतुर सिंह के दिमाग मे झट चतुराई आ गई।
-पापे जी, तुम भी किन पुराने चक्करों मे पड़े हो, अब तो भ्रूण प्रत्यारोपण का जमाना आ गया है। सीधे पेट मे बच्चा गिरवाओ, नौ महीने से पहले ही बच्चा पाओ और अपनी गाय दुहनी शुरू कर दो।
-डॉ साहब, इसमे कितने का खर्चा है?
-जितने महीने का बच्चा डलवाओगे, उतने सौ रुपए लगेंगे।
सरदार जी भी होशियार कम न थे, कुछ सेकेंड मे ही हिसाब लगाया और बोले डॉ साहब आठ महीने का बच्चा डाल दो।
-पापे जी, अभी तो सिर्फ तीन-साढ़े तीन महीने वाले बच्चे की सप्लाई हुई है, वही डाल देता हूँ।
-मूस कितना भी मोटा हो जाय, लोढ़ा नही होगा न। सरकारी हिसाब सरकारी ही रहेगा। अरे जब इतनी तरक्की हो गई है तो आठ महीने वाले बच्चे क्यों नही सप्लाई करते? जरूर बड़े-बड़े लोगों के यहाँ सप्लाई होते होंगे। चलो इस बार जो है वही डालो लेकिन अगली बार आठ महीने वाला ही डालना। सरदार जी ने सख्त हिदायत पिलाई।
डॉ साहब ने भी अपने औजारों से कुछ इधर-उधर किया और सरदार जी से साढ़े तीन सौ रुपये झटक कर अंटी कर लिए। लगभग छह महीने बाद गाय ब्या गई। सरदार जी गदगद। इस दरम्यान डॉ साहब का भी तबादला हो गया और एक पप्पू टाइप के (शरीफ आजकल इसी नाम से पुकारे जाते है) डॉ वहाँ आ गए। सरदार जी की गाय दुबारा बोली तो वो गाय को लेकर फिर पशुचिकित्सालय पहुंचे और डॉ पप्पू को हुकुम सुनाया “डॉ आठ महीने का बच्चा डाल दो”। डॉ पप्पू इस आदेश से पहले तो चकराये लेकिन जब सारा किस्सा सुना तो माजरा समझ मे आया लेकिन उससे क्या होना था सरदार जी तो डॉ पप्पू को खरी-खोटी सुनाते हुए और डॉ चतुर सिंह की वाहवाही गाते हुए अस्पताल से रुखसत हो चुके थे।
क्या समझे?

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