62-दोस्त द्वारा 50 रु अंदर टेबल
आज कल जब एयरटेल का विज्ञापन देखता हूँ तो हॉस्टल के यादगार लम्हों मे से एक लम्हा बरबस ही याद आ जाता है।
चल यार, नैनीताल चलते है, कानपुर से मेरा पुराना दोस्त भी आया हुआ है, तीनों साथ मौज करेंगे।
मित्र, महीने की अंतिम तारीखे चल रही है। अभी घर से ड्राफ्ट आने मे वक्त है। ऐसे मे ठन ठन गोपाल की तरह नैनीताल जाऊंगा तो क्या अच्छा लगेगा? बल्कि तेरे ऊपर एक और बोझ बन जाऊंगा।
अबे रहोगे कंगले ही। बस तुम उठ लो, रुपये-पैसों की फिक्र मत करो।
दोस्तों को न अब मना कर पाता हूँ न तब मना कर पाया। तो फिर हम शाम तक नैनीताल की हसीं वादियों मे पोस्ट हो चुके थे। किराया-भाड़ा, खाना-होटल, दारू-सिगरेट हर जगह हाथ कसमसा के रह जा रहे थे। खैर अगले दिन सुबह वे दोनों ब्रेकफ़ास्ट के लिए बाहर जाने को तैयार हो गए। मैंने बहाना मारा “ यार थकान हो रही है, अभी तुम लोग हो आओ”। लेकिन दोस्त तो ठहरे दोस्त, थर्ड डिग्री की आजमाइश करते हुए रेस्टोरेन्ट तक ले ही गए। नाश्ता खत्म होने के बाद दोस्त ने टेबल के नीचे से चुचाप मेरे हाथ मे सौ का नोट थमा दिया। उसके एक दोस्त के सामने दूसरे दोस्त के आत्म-अभिमान की रक्षा हो गई थी। सच है “हर एक फ्रेंड जरूरी होता है”।
63-उंह, हर साल बच्चों के कपड़ों का ढेर लग जाता है। न रखते बनता है न फेंकते। पहले के जमाने मे तो पुराने कपड़ों के बदले बर्तन मिल जाया करते थे, अब तो वो बर्तनवालियाँ भी नही दिखतीं। दीपावाली की तैयारी मे घर की सफाई करते हुए श्रीमती जी भुनभुना रही थीं।
तो कामवाली को दे दो, उसके बच्चे भी तो अपने जितने हैं। मैंने सहानुभूति दर्शाने के लिए सुझाव दिया।
अरे कहाँ लेती है वो? एक बार कहा था तो सुनाते हुए बोली कि दीदी मैं तो बच्चों को नए कपड़े ही पहनाती हूँ। कसम से खून खौल गया था मेरा तो उस समय।
तो ऐसा करो गठरी बांध के रख दो, कोई भिखारी आएगा, उसे दे देना। कुछ आशीष भी मिल जाएगा।
64-सौभाग्य से अगले दिन एक भिखारी लड़का आ गया। मैंने झट से उसे पुराने कपड़ों की पोटली थमा दी। उसने उसे उलट-पलट कर देखा और बोला “साहब, दस रुपया भी दे दो, छोटे भाई के लिए पटाखे भी ख़रीदूँगा”। मैंने उन कपड़ों को घर से निकालने की गरज से दस रुपये उस लड़के के हाथ मे रख दिये। वो लड़का पोटली लेकर चला तो लेकिन गली के मुहाने पे ही उसे छोड़ कर चल दिया। कुछ ठगे जाने और कुछ अपमान की भावना से क्रोधित होकर मैंने दौड़ लगा कर उस लड़के को पकड़ा। उसने पोटली छोडने का जो कारण बताया तो मैं दंग रह गया “साब हमारे धंधे की यूनिफ़ार्म ही चीथड़े हैं, अच्छे कपड़े पहनने पे भीख कौन देगा”।
65-सर, ये देहजीवा क्या होता है?
देहजीवा होता नही होती है।
अच्छा, देहजीवा क्या होती है?
गंदी औरते होती है जो अपने देह के व्यापार से जिंदा रहती है।
अच्छा, बुद्धिजीवी क्या होते है?
जो अपने बुद्धि के उपयोग से जीवन निर्वाह करते है।
......या अपने बुद्धि के व्यापार से? छात्र ने अपनी शंका प्रकट की।
भरी कोचिंग क्लास मे वो अपने को नंगा महसूस कर रहे थे।
66-स्थान: बच्चों के स्कूल का एनुवल फंक्शन।
माहौल: माइक मे कुछ तकनीकी कमी आने के कारण रह-रह कर तेज सीटी की आवाज आने से बच्चों के आवाज दब जा रही थी, जिससे पैरेंट्स मे बोरियत का वातावरण।
उपरोक्त वातावरण मे बैठा हुआ अपने बच्चे के कार्यक्रम आने का इंतजार कर रहा था। मेरी तरह अब वहाँ वही अभिववक शेष थे, जिनके बच्चों का कार्यक्रम अभी तक नही हुआ था। माहौल के भारीपन को दूर करने लिए पड़ोस मे बैठे सज्जन ने बातचीत का सिलसिला आरंभ किया:
आप का बच्चा किस क्लास मे है?
सेकेंड मे और आपका?
थर्ड मे।
ये स्कूल वाले भी वर्किंग डेज़ मे प्रोग्राम रख देते है। अब ऑफिस अटेंड करें या ये प्रोग्राम एंजॉय करें? मैंने शिकायती लहजे मे कहा।
आप क्या करते है?
क्लास 1 वेटेनेरी ऑफिसर हूँ। “क्लास 1” पर थोड़ा ज़ोर देकर जवाब दिया।
अच्छा, लेकिन विभाग कौन सा है?
पशुपालन विभाग। मैंने उनकी बुद्धि पे तरस खाते हुए और ये जाहिर भी करते हुए जवाब दिया।
आप सर्विस मे हैं या बिजनेस मे ? मैंने बातचीत के सिलसिले को जारी रखने के लहजे से पूछा।
गवर्नमेंट जॉब मे ही हूँ। वे शायद मेरे पहले दिये गए गर्वोक्त उत्तर से चिढ़ गए थे।
अच्छा, अभी जो 7% डी.ए.लगना था, क्या वो लग गया? मैंने ये सोच कर पूछा था कि जैसे औरतों को कपड़े-गहने की बातों मे रुचि होती है वैसे ही आदमियों को वेतन इत्यादि की बातों मे, शायद इसी बहाने बातचीत चलती रहे। लेकिन जो जवाब मिला वो मुझे आईना दिखा गया: “मैं क्लास 1 विभाग मे क्लास 3 कर्मचारी हूँ, इसलिए वेतन और डी.ए. की ज्यादा चिंता नही करता हूँ”।
क्या समझे?
67-बच्चों के लिए गुब्बारे ले लो।
नही बेटा, नही चाहिए। मैंने झुँझलाते हुए कहा।
पापा ले लो न।
बच्चों को देखते ही घेरने लगते है। मैं मन ही मन बुदबुदाया।
क्या करोगे बेटे, दस मिनट मे ही फूट जाएगा।
ऊँSSS ......... छोटा बच्चा मचला।
ले लो, दस के तीन है।
पाँच मे दो दोगे। मैं मोलभाव पे उतार आया।
अच्छा ले लो।
उसके जाने के बाद बड़े बच्चे ने दो मिनट के भीतर ही मोलभाव मे मेरी जीत के भाव को गुब्बारे सा फोड़ दिया “पापा, ये गुब्बारे वाले तो हमारे ही बराबर है, क्या इनका मन इन गुब्बारों से खेलने का नही होता होगा”?
68-तो वहाँ एक बहुत बड़ा दलदल था, जिसमे कीचड़ ही कीचड़ भरा हुआ था। उस दलदल के चारों तरफ एक बस्ती थी। बस्ती वाले उस कीचड़ और उससे उठती बास के साथ ही जीने के अभ्यस्त थे। एक दिन उस बस्ती के चार-छः लोगों ने एक टीम बनाई कि इस दलदल को साफ किया जायगा। फावड़ा-तसला इकट्ठा करके पहला फावड़ा ही चलाया था कि छपाक से कीचड़ के छीटे उनके दामनों पे जा गिरे। अब बस्ती के ही कुछ लोग हल्ला मचाने लगे कि ये तो पहले से ही कीचड़ मे सने है ये क्या दलदल साफ करेगे? टीम के कुछ लोग कीचड़ के छीटो से घबरा कर बैठ गए तो कुछ का प्रयास जारी है। आगे क्या होगा?
69-देहरादून – ऋषिकेश यात्रा: एक लघु नाटक
पात्र परिचय
पाँच नेहायें- पाँच तरुणियाँ, जो पीछे की सीट पे बैठी है।
रजत: एक तरुण, जो बोनट पे बैठा हुआ है।
कंडक्टर: जो कंडक्टर की सीट पे ही बैठा है।
पति, पत्नी और दो बच्चे: जो कंडक्टर के पीछे की सीट पे बैठे है।
बंगाली बाबू: जो पति, पत्नी और दो बच्चों वाली सीट के बगल मे बैठे है।
दुखी राम: जो बोनट के बगल वाली सीट पे बैठा है।
वृद्धा: पांचों नेहाओं की अगली सीट पे दुबकी हुई है।
कंडक्टर के ऋषिकेश-ऋषिकेश चिल्लाने और सुर्रSSS से सीटी बजाने पे बस चल पड़ी।
नेहा न.1: अब तो ऋषिकेश पहुँच ही जाएंगे। ही ही ही
चारों नेहा: ही ही ही
रजत को कुछ बोलना नही है सिर्फ बैठे-बैठे नेहाओं को देखते हुए मंद-मंद स्मित फेंकना है।
पांचों नेहा : ही ही ही
कंडक्टर: टिकट बोलो टिकट
पांचों नेहा: पाँच टिकट ऋषिकेश ही ही ही
पति: दो फुल, एक हाफ ऋषिकेश
कंडक्टर: छोटा कितने साल का है?
पति: साढ़े तीन साल। (अगर भारतीय बच्चों की हेल्थ देखनी हो तो बस मे ही देखनी चाहिए, कसम से तीन साल का बच्चा भी छः साल का लगता है।)
पत्नी: क्या जरूरत थी बड़े वाले की टिकट लेने की। पैसे तो तुम्हारी जेब से बाहर उछलने को बेताब रहते है।
पति: (बेचारगी से) अरे बस मे तो शांत रहा करो।
पत्नी: अपने पैसों को आग लगाओ या पानी मे फेकों, मेरे बला से।
दुखीराम: जौलीग्रांट एक टिकट (सौ रुपए देते हुए)
कंडक्टर: 11 रुपए छुट्टे दो।
दुखीराम: आज नही है।
कंडक्टर: सुर्रsss सुर्रsss , नीचे उतरो-नीचे उतरो।
बंगाली बाबू: ये बोस तुम्हारे बाप का है, जो जहां चाहोगे किसी को उतार दोगे?
कंडक्टर: आप बीच मे बोलने वाले कौन हो?
बंगाली बाबू: एक यात्री हूँ, लेकिन तुम किसी को उतार के देखो। वो पूरे पैसे देता है तुमको, उसका टिकट काटो, तुम्हारे पास छुट्टा नही है तो वो उतर कर देगा।
कंडक्टर: ये जौलीग्रांट वाले 1 रुपए अक्सर नही देते है।
बंगाली बाबू: और जब ऋषिकेश का टिकट 29 रुपया था तो कितने कंडक्टर 1 रुपया वापस करते थे? बेकार की बोत करता है।
पांचों नेहा: ही ही ही
कंडक्टर: एक दो तीन...........................उनतीस। अरे एक टिकट किसने नही लिया है। बूढ़ा माई तुमने टिकट लिया?
वृद्धा: नही
कंडक्टर: तो बोलती काहे नही हो? कबसे गला फाड़ रहा हूँ। कहाँ जाना है?
वृद्धा: जाना तो सबको अंत मे वही है लेकिन बेटा दस रुपए मे तुम जहां तक ले जा सकते हो ले चलो।
जीवन यात्रा जारी है।
Sunday, November 6, 2011
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