Wednesday, November 2, 2011
सात अरब
हालांकि वो अपने को सर्वशक्तिमान मानते हुए ही धरा पे शासन कर रहे थे, फिर भी निहायत एकांत क्षणों मे मन ही मन ईश्वर के सामने हाथ फैला ही देते थे। न ईश्वर उनकी सुनता था, न ही वे ईश्वर की सुनते थे, लेकिन उस रात चमत्कार हो गया। एक धुंधली मानवीय आकृति उनके सामने प्रकट हो गई। ये उस आकृति के सामने अपनी मांगो की लिस्ट रखते उसने उन्हे टोक कर चुप करा दिया। -राजन! अब धारा उल्टे बहेगी, तुमने बहुत ले लिया। अब तुम्हें देना होगा।-आज्ञा करें, सेवा को प्रस्तुत हूँ। वो प्रोफेशनल तरीके से मुस्करा कर बोले। -भोजन का अधिकार, आवास का आधिकार, रोजगार का आधिकार, स्वास्थ्य का आधिकार और वो सभी आधिकार जो तुम सुशासन के नाम पर भोगते हो। -कौन हो तुम??-सात अरबवाँ बच्चा !!!
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