Sunday, November 6, 2011

49-वो देवी के बहुत बड़े भक्त थे। पूरी नवरात्रि लौंग पे ही रह जाते थे। आज महाष्ठमी के अवसर पावन अवसर पर मंदिर से देवी की पूजा-अर्चना करके निकले ही थे कि एक तेजी से जाती स्कूटर से उनके झक सफ़ेद कुर्ते-पाजामे पे सड़क के किनारे इकट्ठे पानी की छीटे पड़ गए। क्रोधावेश मे उनके मुख से धाराप्रवाहिक माँ-बहन की गालियां उच्चारित होने लगी।

50-आज उनको नौ कन्याओं को भोग लगा कर ही नवरात्रि व्रत का उद्यापन करना था। लेकिन शहर मे समस्या नौ कन्याओं को इकट्ठा करने की थी (शायद शहरो मे बिगड़ता लिंगानुपात एक वजह हो)। आस-पड़ोस मिला कर कुल चार कन्याएँ ही वो इकट्ठी कर पाये थे। शेष पाँच कन्याएँ उन्होने पास की बस्ती की घूम रही बालिकाओं को बुला कर पूरा कर लिया। पहचान की चार कन्याओं को भोजन स्टील की नई थाल-कटोरी मे मिला और बस्ती की पाँच कन्याओं को थर्माकोल की प्लेट मे। जय हो देवी माँ के भक्तों की!
51-वो जमीदोंज मकानों के सामने उकड़ू बैठा हुआ जमीन पे लकीरें खींच रहा था, मानो वहाँ नक्शा खींच कर उसमे अपना मकान खोज रहा हो। जलजला आए 48 घंटे बीत चुके थे लेकिन मलबे से अभी भी शव निकल रहे थे।
चलो भाई, यहाँ से चलो.......
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कब तक यहाँ बैठे रहोगे.......
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घर मे कौन-कौन था.............
फिर वही चुप्पी लेकिन उसकी निर्विकार दृष्टि प्रश्नकर्ता के चेहरे पे टिक गई।
गहरे सदमे मे है.................
अरे देखो, संभाल के, देखो माँ मरते समय भी बच्चे को कैसे दुबका कर बचाने की कोशिश कर रही थी।
वह बिजली की तरह दौड़ कर वहाँ पहुँचा। उसके भीतर का जलजला चीख़ों के रूप मे बाहर निकलने लगा था।

52-जगह-जगह मेलों-ठेलों मे घूमते हुए बच्चो के खिलौने बेचना ही उसका पेशा था। तीर-तलवार, गदा, हाथी-घोड़े, भोंपू-सीटी तरह-तरह के मनभावन खिलौने। हर माल पाँच रुपये, पाँच रुपये, पाँच रुपये! बंबई से आया मेरा दोस्त, बच्चों तेरे लिए! हाथी लाया, घोड़े लाया बच्चों तेरे लिए! हर माल पाँच रुपये, पाँच रुपये, पाँच रुपये! वो तरह- तरह से गाकर-नाचकर बच्चों को रिझाया करता था और बच्चे भी उसकी फेरी पर आकर उसे छेडते थे। ताऊ हाथी कितने का है, ये बोलेगा भी। चाचा तीर-तलवार और गदा दोनों पाँच मे दोगे? इधर चार लड़के उसे बातों मे फसाते थे और उधर दो लड़के खिलौने निकाल के भाग खड़े होते थे। वो पीछे से चिल्लाता था अरे करमजलों! बाप ने चोरी सिखायी है, गरीब को सताते हो, शरीर मे कीड़े पड़े तुम्हारे और लड़के थे कि हसते- खिलखिलाते भाग जाते थे। अब तो वो बुड्ढा हो गया था। आज दशहरे के मेले मे भी उसने फेरी लगाई थी। लड़को का एक झुंड फिर आया और उसी तरीके से कुछ लड़के उसके खिलौने ले भागे। उसने फिर से चिल्ला-चिल्ला कर गालियां दी- अरे करमजलों! बाप ने चोरी सिखायी है, गरीब को सताते हो, शरीर मे कीड़े पड़े तुम्हारे। लेकिन मन मे ही बुदबुदाया “तुम्हारे बचपन सलामत रहें, यूं ही हसते-खिलखिलाते रहो, मेरा क्या, आज के तो बत्तीस रुपये कमा ही चुका हूँ”।

53-क्या करूँ? नींद नही आ रही है। पति और बच्चे घोड़े बेच कर सो रहे है। मेरा तो किसी को ध्यान ही नही है, जीऊँ या मरूँ। लेकिन करूँ तो क्या करूँ, रात के एक बज रहे है। चलो टी वी ही देखते है, लेकिन वो तो दिन भर देखा ही था लेकिन दूसरा चारा ही क्या है? अरे वही प्रतिज्ञा, बड़ा उबाऊ है। दूसरा चैनल, ऊँह वही क्राइम पेट्रोल, ये सब देख लूँगी तो तीन दिन तक डर के मारे ही नींद नही आएगी और ये सब देखो तो पति भी कितना डरावना लगता है। चलो अगला चैनल, राम राम एफ़ टी वी, ये तो औरतों को न जाने क्या समझते है, पता नही जिंदा भी समझते है या निर्जीव पुतले मानते है। चलो कुछ और ट्राई करती हूँ, उफ ये डिस्कवरी, मुए वही शेर को किसी भैंसे को नोच-नोच कर खाते दिखाते है। नेक्सट चैनल, ये क्या रात भर टेली मार्केटिंग करते रहते है, अभी ऑर्डर करने पर एक्सरसाइज मशीन के साथ बैलेन्स एक महीने प्रोटीन डाइट सप्लीमेंट मुफ्त, बकवास। अरे ये क्या आ रहा है, लाल किताब के उपाय! हूँ ये देखती हूँ शायद नींद का भी कोई उपाय पंडित बता दे। ज़िंदगी कितनी बोर है?

54-आज का अखबार उठाते ही उसकी रूह मे झुरझुरी दौड़ गई। बैंक ने महंगाई रोकने के लिए किए गए उपाय के क्रम मे होम लोन पर 0.5% ब्याज दर बढ़ा दी थी। इसका सीधा मतलब था ई एम आई मे बढ़ोत्तरी यानी होम लोन का महंगा होना यानी दो कमरे के मकान के लिए लिए गए लोन की ईएमआई अब 17000 से बढ़ कर 18000 हो जाना। उसने अगले पेज पलटे तो देश के धनकुबेरों के महलों की खबरे छपी थी। कई-कई तल्लों वाले महल, जिनमे इतने एशों-आराम के साधन उपलब्ध थे कि उसके आगे इन्द्र की अमरावती भी फेल। फिर अगले पन्ने पर ग्लोबल विलेज की कुछ चर्चा छपी थी। ग्लोबल विलेज शब्द पढ़ते ही उसका मुंह कसैला हो गया- “अमीरों का एक और सपने बेचने वाला शब्द। हमारा बचपन भी गाँव मे ही बीता था, लेकिन वहाँ इतनी अधिक आर्थिक विषमता नही थी। हमारे पास फूस के छप्पर होते थे तो गाँव के साहूकार के पास खपरैल का मकान ही होता था”। वह फिर से बढ़ी ईएमआई को पूरा करने लिए सोचने लगा था कि दूध का बजट कम करे या सब्जी का।



56-मैं कक्षा तीन मे था जब माँ ने डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बचपन की कहानी सुनाई थी कि वो पढ़ने मे इतने कुशाग्र बुद्धि थे कि प्रश्नपत्र मे लिखा था कि किन्ही आठ प्रश्नों के उत्तर दे तो उन्होने सारे प्रश्नों के उत्तर दे दिये और अंत मे लिख दिया किन्ही आठ प्रश्नों के उत्तर जांच ले। मैं इससे बड़ा प्रभावित हुआ और गणित की परीक्षा मे सारे प्रश्न हल करने के बाद लिख दिया किन्ही आठ प्रश्नों के उत्तर जांच ले और अध्यापक ने चुन-चुन कर वो उत्तर जाँचे जो गलत थे। ये मेरा ज़िंदगी का पहला सबक था कि किसी की नकल न करना, मारे जाओगे।



57-माँ आज बहुत पीड़ा हुई, जब डॉ मेरी चीर-फाड़ कर रहा था। मैं उम्मीद कर रही थी कि आप मुझे बचा लोगी लेकिन आप मेरी मदद को नही आई। मै आपसे पूछ भी नही पायी कि माँ मेरी गलती क्या थी कि आपने मुझे अपने से इतना दूर कर दिया। मै कितना उल्लासित थी कि जब आपसे मिलूँगी तो आपकी अंगुलियाँ पकड़ कर चूमूंगी और ............और पापा से मिलने को भी कितना उत्सुक थी, सोचती थी पापा को अपनी नर्म हथेलियों से हौले-हौले गुदगुदाउगी तो कितना आनंद आयेगा। मैंने माँ-पापा के बारे मे कितना सुना था कि वो तो भगवान से भी बड़े होते है लेकिन ये मेरा ही दुर्भाग्य था कि आप लोगो के दर्शन भी न कर पायी। माँ, आप और पापा तो इतना पड़े-लिखे हो तो क्या इतना बता सकते हो कि पहले तो बड़े होने के बाद लड़कियों को परिवार से दूर किया जाता था लेकिन अब जन्मने के पहले ही क्यूँ?

58-शुक्ला जी राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के छात्रों के कोचिंग इंस्टीट्यूट मे अध्यापक थे। सुकुमार वल्द हीरा लाल “आई.ए.एस.” भी उस इंस्टीट्यूट के भाग्यशाली विद्यार्थी थे, जिनका चयन प्रशासनिक सेवा मे हो गया था। शुक्ला जी ने बधाई देने के बाद तंज़ कसा “अरे भाई सुकुमार, आप तो क्रीमी लेयर वाले थे, आपको तो कुछ गुरुदक्षिणा देनी चाहिए”। सुकुमार भी कम न थे, “कही अँगूठा तो नही चाहिए गुरु जी”। “दे सकते हो” शुक्ला जी ने भी कड़वाहट बरकरार रखते हुए पूछा और सुकुमार ने ठेंगा दिखा दिया।

59-अपने यहाँ मुफ्त मे सलाह देने वाले जीव बहुतायत मे पाये जाते है। ऐसे ही एक श्रीमान जी आज मुझसे टकरा गए और छूटते ही सलाह मेरी तरफ उछाल दी “श्रीवास्तव जी, अपनी पुरानी स्कूटर निकाल कर एक्टिवा ले डालो”। मैंने पूछा “क्यों, क्या अब पाँच हजार मे मिलने लगी”? वो अचकचाए लेकिन फिर संभलते हुए बोले “अरे नही, उसमे किक नही लगानी पड़ती, सेल्फ स्टार्ट है”। मैंने प्रतिवाद किया “श्रीमान जी, आप मेरी किक की कीमत 40000-45000 हजार की आँक रहे है। मेरे हिसाब से ये फ्री है, सैंपल दूँ क्या”? फिर वो नज़र नही आए, ऐसा क्यों?

60-पहली कसम
ये बारह साल पहले की शरद ऋतु की एक खूबसूरत सुबह थी जब मैं अपने कंट्रोलिंग अफसर के साथ अपने कक्ष मे बैठा हुआ अपने कार्य निपटा रहा था। अचानक एक परेशानहाल अधेड़ महिला कमरे मे घुसी।
विकास श्रीवास्तव जी कहाँ है?
हम दोनों की प्रश्नवाचक निगाहें उन पर अटक गई।
यहाँ तो कोई विकास श्रीवास्तव नही है। कुल जमा एक श्रीवास्तव है और वो ये है। मेरे कंट्रोलिंग अफसर ने मेरे तरफ इशारा किया।
बाबू, मैं सीतापुर से अपने बेटी-दामाद से मिलने आई थी। उनका कुछ पता नही चल रहा है।
जी, मैं तो इस ऑफिस मे नया हूँ, मुझे तो कोई ज्यादा जानकारी नही है। मैंने कहा।
इस ऑफिस मे तो पिछले पाँच सालों से कोई विकास श्रीवास्तव नही है। आप गलत जगह आ गई है, उनका कोई पता तो आपके पास होगा। मेरे कंट्रोलिंग अफसर ने उनसे कहा।
नही, मुझे बस इतना पता है कि वो डेरी मे काम करते है।
तो, यहाँ तो कोई विकास श्रीवास्तव नही काम करते और पूरे अमरोहा जिले मे कोई विकास श्रीवास्तव डेरी मे नही है, इतना मुझे अच्छी तरह पता है। मेरे कंट्रोलिंग अफसर ने जवाब दिया।
अब मैं क्या करूँ, मेरे तो सारे पैसे भी खत्म हो गए। ये कहकर वो रोने लगीं।
पता नही पैसे की बात सुनकर या व्यर्थ की बातें सुनकर मेरे कंट्रोलिंग अफसर ने अपना सिर अपनी फाइलों मे ऐसे झुका लिया जैसे वो महिला वहाँ उपस्थित ही न हो। उनके इस अप्रत्याशित व्यवहार पर मुझे बड़ा क्षोभ हुआ। वो महिला भी उनके इस बदले रूख को देखकर मेरे तरफ मुखातिब हुई।
बाबू, ये मेरी बालियाँ रख लो और मुझे पाँच सौ रुपये दे दो, मेरे पास वापस जाने के भी पैसे नही है। वो अपनी बालियाँ उतारती हुई बोली।
अरे, आप अपनी बालियाँ अपने पास ही रखें। मेरे पास दो सौ रुपये ही है, ये रख ले। इतना आपके किराये के लिए और रास्ते के लिए काफी होगे। अभी एक ट्रेन लखनऊ जाने वाली है, उससे सीतापुर तक निकल जाइए। मैंने उससे सहानुभूतिपूर्वक कहा। वो मुझे आशीष देते हुए चली गई।
अजीब अहमक़ हो, इतनी दरियादिली दिखाने की क्या जरूरत थी? उसके जाते ही मेरे कंट्रोलिंग अफसर ने मुझसे कहा। दरअसल आज से बारह साल पहले दो सौ रुपये मेरी तनख्वाह के अनुपात मे बहुत अधिक थे।
सर वो कितनी परेशान थी। उसकी मदद करना मेरा फर्ज़ था।
अभी जवानी है और शादी भी नही हुई है, इसीलिए ये दरियादिली है। लेकिन वो औरत तुम्हें ठग गई है और मेरे बात पर विश्वास न हो तो स्टेशन पास मे ही है, जाकर देख लो वो वहाँ नही मिलेगी। मैं भी उनका चैलेंज स्वीकार कर स्टेशन पर चला गया। अभी ट्रेन नही आई थी लेकिन वो महिला टिकट काउंटर से लेकर पूरे प्लेटफार्म पे कहीं भी नही दिखाई दी। मैंने ट्रेन के आने का इंतजार किया, ट्रेन आई और चली भी गई लेकिन उन मोहतरमा के दर्शन सुलभ नही हो सके। मैं बुझे मन से ऑफिस वापस आ गया। मेरी पिटी हुई सूरत देखकर वो मुस्कराये। उनकी मुस्कराहट देखकर मैं आहत भाव से बोला- सर आप अगर जानते ही थे तो उसी समय क्यों नही टोका।
अगर उसी समय टोक देता तो ये सबक कैसे सीखते?
मैंने भी उसी समय कसम खाई “आगे से मैं किसी भी भटके हुए को वापस घर जाने देने के लिए रुपये नही दूँगा”।

61-दूसरी कसम
ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन
हॅलो, कौन?
अरे मैं अमरोहा से मिश्रा बोल रहा हूँ। कहाँ हो आप?
लखनऊ मे हूँ, क्यों? इस बार तो एप्लीकेशन देकर आया हूँ।
लेकिन आप औरत को भगा कर क्यों ले गए? आपको पूछने पुलिस आई हुई है।
क्या बात करते हो मिश्रा जी?
मिश्रा-विश्रा कुछ नही, आप फटाफट वापस आ जाओ।

अगले दिन इंस्पेक्टर मेरे कार्यालय मे तहक़ीक़ात कर रहा था।
डॉ साहब, दिखने मे मासूम दिखते हो लेकिन काम शातिरो वाले करते हो।
अनाप-शनाप इल्जाम लगाने से पहले वाकया क्या है, ये तो बताइये?
डॉ साहब, पूछेंगे आप नही, पूछेंगे हम।
तो पूछिए...
तीन दिन पहले आप सरकड़ी गए थे?
हाँ...
क्यों, दूसरे की जोरू भगाने?
क्या बात करते है? मुझे दूसरे की बीबी भगाने की क्या जरूरत है?
ये तो आप जानो, लेकिन सरकड़ी गए क्यों थे?
वहाँ जानवरों के इलाज के लिए कैंप लगाना था।
तो वहाँ क्या किया?
26 गाय और 88 भैंस का इलाज किया। ये कोई जुर्म है?
लेकिन दूसरे की जोरू भगाना तो जुर्म है।
अब उसका इस बात का बार-बार दुहराना मुझे चिढ़ाने की हद तक चुभ रहा था।
अरे किसने कहा कि मैंने दूसरे की जोरू भगाई है?
हाँ, अब आए मुद्दे पर, तो ये बताओ कि उस दिन लौटते हुए अपनी गाड़ी मे एक औरत और उसके बच्चे को बैठा कर नही लाये थे?
अरे तो इतनी दोपहर मे एक औरत अपने बच्चे के साथ सुनसान रास्ते पर लिफ्ट मांगेगी तो मानवता के नाम पर क्या आप लिफ्ट नही देगे? उस औरत ने मुझसे सड़क तक लिफ्ट मांगी, मैंने दे दी। इसमे क्या गलत था? आप चाहो तो ड्राइवर से पूछ लो।
गलत यही था कि वो घर से भागी हुई थी और किसी ने उसको आपकी गाड़ी मे बैठे देखा था। इसीलिए हम आपसे पूछताछ कर रहे थे। खैर आपने उसे कहाँ उतारा था?
बस स्टॉप पर।
आपको हुई तकलीफ के लिए हमे खेद है। लेकिन आगे से किसी औरत को लिफ्ट देने से पहले तहक़ीक़ात कर लीजिएगा कि वो घर से भागी हुई तो नही है। इंस्पेक्टर शरारत से मुस्कराया और मैंने कसम खाई कि अब भविष्य मे किसी औरत को लिफ्ट नही दूँगा।


तीसरी कसम
जिन दोस्तों को आज मेरी तीसरी कसम का बेसब्री से इंतजार होगा, आज उनको निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि “तीसरी कसम” तो श्रध्येय राजकपूर जी के लिए आरक्षित है। अतः नैतिक रूप से मैं तीसरी कसम नही ले सकता।
मेरी अगली कसमें
एक रात “ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का” पे झूमता-गाता हुआ एक समूह मुझे मंडप मे ले गया, जहां मुझे अग्नि के चक्कर कटवाते हुए सात कसमें दिलवाई गई। उन कसमों को पूरा करते-करते अब अगली कसमें खाने का वक्त ही नही मिलता, फिर भी उन सात कसमों के नाम पर यदा-कदा नकेल कस ही दी जाती है।

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