Tuesday, November 1, 2011

एक बन्दर की मौत

“इतना हरा-भरा पेड़ कटवाया भी नही जा सकता है और ये कौवे पूरा आँगन गंदा करे दे रहे है”। माँ का खीझना स्वाभाविक भी था क्योंकि साफ-सफाई भी तो उन्हे ही करवानी पड़ती है।
“चिंता मत कर माँ, अभी एयर राइफल से इन्हे उड़ा देता हूँ”। रजत इंजीनियरिंग कालेज मे द्वितीय वर्ष का छात्र था और सेमेस्टर ब्रेक मे अपने कस्बे वापस आया था।
टुक.................
चीं......... चीं......... चीं..........
धाप.................
लेकिन किसकी मौत किसके हाथों कब होनी है, ये किसे पता होता है? एयर राइफल से चली गोली अनजाने मे बंदर को लग गई और पेड़ पर से गिरने के कारण बंदर की मौत हो गई। ये घटना आग की तरह कस्बे मे फैल गई। कस्बे के दूसरे छोर पे हरी सिंह रहते थे। हरी सिंह विधायकी के टिकट के मजबूत दावेदार थे लेकिन सीट सुरक्षित हो जाने से टिकट रजत के बाबू माखनलाल को मिल गया था। एक तो माखनलाल राजनीति के मैदान के नौसिखिया खिलाड़ी, उस पर भी हरी सिंह का भितरघात, इसलिए चुनाव हारना तो निश्चित था लेकिन हरी सिंह के मन से काँटा अभी तक निकला नही था। आज हरी सिंह के भाग्य से छींका फूट ही गया।
-बजरंग बली की जय!
-धर्म का अपमान नही सहेंगे....नही सहेंगे!
-हत्यारे को फांसी दो। फांसी दो........ फांसी दो।
नारे लगाते हुए सैकड़ों लोंगों ने थाने का घेराव कर लिया। थोड़े से लोगों ने जानवरों के अस्पताल को भी घेर लिया।
क्या थानेदार साहब, अब इस देश मे कुछ धर्म-पानी रहेगा या घोर कलयुग ही आ गया है?
हरी बाबू, इतना उखड़ने की बात तो नही है, माखनलाल आपकी पार्टी के ही उम्मीदवार थे। उनके बच्चे से नादानी मे ऐसा हो गया। थानेदार भी अनुभवी था और बातों को उनकी तह तक समझता था।
पार्टी अलग है और धर्म अलग है। दोनों को एक ही मे क्यो घोंस रहे हो थानेदार साहब? आप तो अपनी कार्यवाही करो।
थानेदार जानवरों के डाक्टर को लेकर माखनलाल के घर पहुंचा। वहाँ पे बंदर के शव का पोस्टमार्टम हुआ। लेकिन थानेदार माखनलाल और रजत को समझा-बुझा कर थाने ले आया।
माखनलाल, कुछ धरम-वरम बचा है या सब दंभ मे भूल गए हो।
हरी बाबू, हम भी तो हिन्दुए हैं, अइसा पाप जान-बूझ के थोड़े ही करेंगे।
अरे माखन तुलसी बाबा तो बहुत पहले ही कह गए थे कि हंस चुगेगा दाना और कौवा मोती खाएगा।
हरी बाबू, जौन हुआ तौन हुआ, अब हमे रास्ता सुझाइए, गलती तो लौंडे से हो ही गई है।
जब गलती हो गई है तो उसका प्रायश्चित भी करना पड़ेगा। अगर रामभक्त हनुमान के वंशज का प्राण तुम्हारे सपूत ने हरा है तो उसे माफी भी भगवान राम ही देंगे। रामलीला मैदान मे तुमको और रजत को भगवान राम के पैर छूकर माफी मागनी पड़ेगी। बोलो तैयार हो।
माखन बाबू ज्यादा सोच-विचार मत करो, लड़के के भविष्य की बात है, माफी मागने मे कुछ घिसता नही है। थानेदार ने माखन को समझाया। माखन भी लड़के के भविष्य के नाम पर राजी हो गया। शाम को ही रामलीला मैदान मे मंच सजा, हरी बाबू के लड़के ने भगवान राम का रूप धर कर माखन और रजत को क्षमादान दिया।
इस सारे नाटक के बाद थानेदार माखनलाल को किनारे ले जाकर पंजे से इशारा करते हुए बोला- ये सब माफी-वाफ़ी तो अपनी जगह है, कानूनी मामला है, रिपोर्ट-विपोर्ट भी ठीक करनी होगी।थोड़ा-बहुत खर्चा-पानी तो करना ही पड़ेगा।
माखनलाल थानेदार को पाँच हजार देने के बाद गहरी सांस छोडते हुए बोला “जय बजरंगबली”।

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