भरोसे को लोगों ने इतना छला है
अब ये लफ्ज ही बेमानी हो चला है।
क्या मलाल था अब इसका क्या जवाब दूं
वक़्त ऐ रुखसत में हूँ,तेरी दुआ चाहता हूँ।
खुश रहना अहले सफ़र वालों,
मंजिल करीब है, विदा चाहता हूँ.
सुनायी देती है अब मस्जिदों से अजान,
चरागे सहर था, बुझा चाहता हूँ।


No comments:
Post a Comment