बाशिंदा-ऐ-मुल्क होने का सबूत वो क्या दे,
जिसने ता-जिन्दगी रेल भी न देखी।
आज रास्ता इतना लंबा लगता है क्यूँ,
हमसफ़र रूठा हुआ है न क्यूं।
वक़्त ने चेहरे पे लकीरें खींच दी है तो क्या,
यादों के कुछ बेहतरीन नगीने हमारे भी खाते में है।
लगता है मेरा बेटा तो पा ही जाएगा मेरा इन्साफ,
मुंसिफ के दर पे दरख्वास्त आज मैंने भी लगाई है।
बूढा होने तक पा ही जाउंगा अपना आशियाँ,
अर्जी की फ़ाइल आज मैंने भी बढ़ाई है।
कतरा-कतरा हो के आप ही निकल जायेगी पथरी मेरी
सरकारी हस्पताल में इलाज को लाइन आज मैंने भी लगाई है।
सिद्धार्थ "लुपुक"

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