Sunday, February 27, 2011
Saturday, February 26, 2011
Friday, February 25, 2011
Saturday, February 19, 2011
चरागे सहर
भरोसे को लोगों ने इतना छला है
अब ये लफ्ज ही बेमानी हो चला है।
क्या मलाल था अब इसका क्या जवाब दूं
वक़्त ऐ रुखसत में हूँ,तेरी दुआ चाहता हूँ।
खुश रहना अहले सफ़र वालों,
मंजिल करीब है, विदा चाहता हूँ.
सुनायी देती है अब मस्जिदों से अजान,
चरागे सहर था, बुझा चाहता हूँ।

Friday, February 11, 2011
नए- ताजे शेर
बाशिंदा-ऐ-मुल्क होने का सबूत वो क्या दे,
जिसने ता-जिन्दगी रेल भी न देखी।
आज रास्ता इतना लंबा लगता है क्यूँ,
हमसफ़र रूठा हुआ है न क्यूं।
वक़्त ने चेहरे पे लकीरें खींच दी है तो क्या,
यादों के कुछ बेहतरीन नगीने हमारे भी खाते में है।
लगता है मेरा बेटा तो पा ही जाएगा मेरा इन्साफ,
मुंसिफ के दर पे दरख्वास्त आज मैंने भी लगाई है।
बूढा होने तक पा ही जाउंगा अपना आशियाँ,
अर्जी की फ़ाइल आज मैंने भी बढ़ाई है।
कतरा-कतरा हो के आप ही निकल जायेगी पथरी मेरी
सरकारी हस्पताल में इलाज को लाइन आज मैंने भी लगाई है।
सिद्धार्थ "लुपुक"
Thursday, February 10, 2011
बस यूं ही
क्या कहा, खुद मुंसिफ पे ही इल्जाम है,
अहिस्ता बोलो, दीवारों के भी कान है।
लाख परदे में छिपाओ, सच तो खुलेगा,
क्या मुर्गे को छिपाने से सूरज नहीं उगेगा ।
Wednesday, February 9, 2011
बिखरे बिखरे अल्फाज़
औ काले को रंगीन
हमें दुनिया से क्या वास्ता
हम तो है सिर्फ तमाशाबीन।

लूटने वाला हमें कौन था,
हमारा रहनुमा या कोई रहगुजर,
हमें क्या खबर,हम तो ठहरे चिर बेखबर।

कविता को तूने सीढ़ी बनाया,
पहुचने को सत्ता के हरम में,
कविहृदय, माँ भी तेरी शर्मिन्दा होगी,
तेरे इस करम पे।







