
Sunday, January 30, 2011
Saturday, January 29, 2011
Friday, January 28, 2011
Wednesday, January 26, 2011
Tuesday, January 25, 2011
Monday, January 24, 2011
Friday, January 21, 2011
Thursday, January 20, 2011
Wednesday, January 19, 2011
Monday, January 17, 2011
Thursday, January 13, 2011
संक्रांति की शुभकामनाएं
संक्रांति (खिचडी) का पर्व मुझे प्रिय है क्योंकि यह पर्व दो विपरीत परिस्थितियों (शीत- ग्रीष्म, काली उरद- सफ़ेद चावल, कडवे तिल- मीठा गुर) का मिलन बिंदु है और यह पर्व हमें इन विपरीत परिस्थितियों को भी आनंद के साथ मनाने का अवसर प्रदान करता है। हम जबरदस्त विरोधाभासों के बीच जीते है। यह विरोधाभास हमारे भीतर प्रेम- घृणा, सुख-दुःख जैसे मनोभावों के रूप में है और अमीरी-गरीबी, शिक्षित- अशिक्षित जैसे रूपों में बाहर भी। लेकिन
हमें इन अंतर्द्वंदों के बीच ही आनंद के साथ जीना है और यही सीख अगली पीढ़ी को भी देना है। सर्वे भवन्तु सुखिनः के भावों के साथ आप सबको पुनः संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।
हमें इन अंतर्द्वंदों के बीच ही आनंद के साथ जीना है और यही सीख अगली पीढ़ी को भी देना है। सर्वे भवन्तु सुखिनः के भावों के साथ आप सबको पुनः संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।
Wednesday, January 5, 2011
क्षणिकाए
रिश्तो में अब हम व्यापारी होने लगे,
क्या दिया और क्या पाया,
हिसाब अंगुलियों पे लगाने लगे ।
रिश्ते अब सिकुड़ते जा रहे है,
कंट्रोल्ड computerized रिश्तो के अन्दर,
क्योंकि वहाँ कोई टोक नहीं सकता,
चस्पा झूठी मुस्कराहट पर।
बच्चे को अपने
सारी दुनिया समझाने की मुझे थी फ़िक्र
लेकिन कल मैं शर्मिंदा था,
जब उसने किया,
दादा- दादी क्या होते हैं,
इसका मासूम सा जिक्र।
क्या दिया और क्या पाया,
हिसाब अंगुलियों पे लगाने लगे ।
रिश्ते अब सिकुड़ते जा रहे है,
कंट्रोल्ड computerized रिश्तो के अन्दर,
क्योंकि वहाँ कोई टोक नहीं सकता,
चस्पा झूठी मुस्कराहट पर।
बच्चे को अपने
सारी दुनिया समझाने की मुझे थी फ़िक्र
लेकिन कल मैं शर्मिंदा था,
जब उसने किया,
दादा- दादी क्या होते हैं,
इसका मासूम सा जिक्र।
Subscribe to:
Comments (Atom)
















